Thursday, November 24, 2022

लॉस्ट कोई स्टूडियो आधारित फिल्म नहीं है, यह वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित कहानी है: यामी गौतम


azadi ka amrit mahotsav

लॉस्ट कोई स्टूडियो आधारित फिल्म नहीं है, यह वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित कहानी है: यामी गौतम


लॉस्ट एक खोजी थ्रिलर फिल्म है जो संवेदना और सत्यनिष्ठा के खोए हुए मूल्यों की उच्च खोज का प्रतिनिधित्व करती है

गोवा में भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के 53वें संस्करण के मौके पर आज पीआईबी द्वारा आयोजित "टेबल टॉक्स" सत्र में यामी गौतम ने कहा कि लॉस्ट कोई स्टूडियो आधारित फिल्म नहीं है, यह वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित कहानी है। आप कहानी में डूबकर चरित्र के हर हिस्से को महसूस कर पाएंगे, जो हमारे आत्म-अनुभव और हमारे आसपास की दुनिया को प्रतिध्वनित करता है।

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फिल्म में मुख्य किरदार की भूमिका निभाने का अपना अनुभव बताते हुए यामी ने कहा, जब ऐसा किरदार आपके सामने आता है तो उसे निभाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा, "कभी-कभी हमें लगता है कि थोड़ा ही काफी है और मैंने इस सिद्धांत का पालन किया। मैंने वास्तव में फिल्म में चरित्र को चित्रित करने की कोशिश नहीं की। मैं किरदार के अंदर ही थी, जैसा वह होता है।"
यामी ने कहा कि कई बार लोगों को ऐसे चरम अनुभव होते हैं, जिन्हें शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। उन्होंने कहा, "लॉस्ट एक खोजी थ्रिलर है, जो उस गहन व्यक्तिगत अनुभव को दर्शाता है।"

निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने कहा कि लॉस्ट व्यावहारिक तरीके से मीडिया की सत्यनिष्ठा के मुद्दे पर प्रकाश डालता है।

यामी के किरदार के बारे में अधिक जानकारी देते हुए, अनिरुद्ध ने कहा कि यह एक बहुत ही गहन आंतरिक संघर्ष है जिससे चरित्र गुजरता है। उन्होंने कहा, “कुछ भूमिकाओं में बहुत सारे संवाद और तत्व होते हैं जिन्हें आपको करने की आवश्यकता होती है, लेकिन यह सिर्फ एक चरित्र नहीं है, यह एक दृढ़ विश्वास और प्रतिबद्धता है। असली यामी को जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।"

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इस फिल्म को आज इफ्फी में प्रदर्शित किया गया और इसे दर्शकों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
फिल्म के बारे में
1. अनिरुद्ध रॉय चौधरी (निर्देशक)

2. यामी गौतम (अभिनेत्री)

3. पंकज कपूर (अभिनेता)

4. तुषार पांडे (अभिनेता)


सारांश
सच्ची घटनाओं से प्रेरित फिल्म लॉस्ट एक ऊर्जावान युवा महिला क्राइम रिपोर्टर की कहानी है जो एक युवा थिएटर कलाकार के अचानक गायब होने के पीछे की सच्चाई की अथक खोज में लगी हुई होती है। एक खोजी थ्रिलर जो एक उच्च खोज का प्रतिनिधित्व करती है, संवेदना और सत्यनिष्ठा के खोए हुए मूल्यों की खोज है।


पूरी बातचीत यहां देखें:

Thursday, October 6, 2022

आर एस एस के अंग्रेज

आरएसएस के अंग्रेज

पिताजी बंशीधर जी की डायरी से


1975 की इमरजेंसी अपने चरम पर थी संघ के अधिकारी उससे अछूते नहीं थे। लेकिन उनमें से कुछ विशेष को बाहर रहकर सांगठनिक जिम्मेदारी निभानी थी। मैं

 उसी समय की एक खास घटना बताता हूं। 

घर बरेली के नजदीक एक खास गोपनीय मीटिंग एक बड़े अधिकारी ने लेनी थी। जिन लोगो को उसमे शामिल होना था उन्हें पहले मेरे घर आकर उस स्थान का पता और समय लेना था तभी वो शामिल हो सकता था। मीटिंग नियत समय पर होनी थी। मैं भी सही समय पर पहुंच गया था । बड़ी असमंजस की स्थिती थी मीटिंग कौन लेगा। 

एक सज्जन वहां थे एकदम गोरे सफारी सूट में हैट लगा हुआ था कोई अंग्रेज थे। सभी आश्चर्य में थे संघ की इस मीटिंग में कोई अंग्रेज कैसे आ सकता है। 


उन्होंने जैसे ही बोलना शुरू किया सब आश्चर्य में रह गए वो अंग्रेज कोई और नहीं रज्जू भैया थे। रज्जू भैया क्लीन शेव्ड उनकी सदाबाहर मूछें गायब थी, हमेशा धोती कुर्ते में रहने वाले रज्जू भैया सफारी सूट में हो सकते है कल्पना से परे था। जब वो सरकार्यवाह हुए तब से कई बार सानिध्य मिलता रहा था।


जब वो मीटिंग खत्म हुई उसके बाद मेरे जीवन का विशेष क्षण आया जब निश्चित हुआ कि तीन चार लोगो के साथ रज्जू भैया मेरे घर आकर चाय नाश्ता करेंगे


आपातकाल में यह प्रसाद मुझे मिला इतने बड़े महानुभाव के चरण मेरे घर में पड़े। मैने अवश्य इस या किसी जन्म में अच्छे कर्म किए होंगे जो मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के घर में प्रसिद्ध लोग आते रहे।

Monday, July 11, 2022

40 दिन सुबह 3 बजे ध्यान


आज मुझे 40 दिन 3 बजे सुबह ध्यान करते हुए हो गए है। ऐसा नही है मैं पहले ध्यान नहीं कर रहा था या सुबह 3 बजे नही उठ रहा था लेकिन ऐसा लगातार नही हो पा रहा था कभी आईपीएल के मैच देखने लगा तो कभी कोई फिल्म या सीरीज तो कभी 11 बजे कभी 12 रात सोना होता तो स्वाभाविक है सुबह 5, 6 सुबह उठना होता था। उस समय ध्यान करने में वो आनन्द नही आता जो सुबह तीन बजे मुझे आता था। 

इसलिए जून 1 से प्रण लिया सुबह 3 बजे उठकर ही ध्यान करना है 40 दिन का ध्येय रखा। मुझे खुशी है मैं सफल रहा। ऐसा नही है इन 40 दिनों में ऐसी स्थिति न आई हो मैं अपने नियमित समय 9 बजे ही सो गया हूं, मुझे याद आता है चार मौके ऐसे आए जब मैं 11 बजे सोया एक रात तो 1 बजे सोया लेकिन उठा तीन बजे ही, और ध्यान किया। ध्यान पर विस्तार से बात करने और उसके लाभ बताने से पहले बताता हूं शुरुआत कैसे हुई। 

2015 में अचानक मेरा मन और दिमाग मेरे स्थायी जमे जमाए काम फिल्म पीआर से ऊब गया। कुछ ही दिन बाद मैने ऐसा ही किया भी। मुझे समझ नही आ रहा था ऐसा मैने क्यों किया। कमाई का कोई स्थाई साधन तो था नही सिवाय इसके जितने पैसे की जरूरत पड़ती थी उतने पैसे मेरे एक अकाउंट में आ जाते थे। कैसे उसके लिए मेरा ब्लॉग पढ़िए लिंक नीचे दिया है।


अपना काम बंद करने के बाद मुझे मेरी बेटी ने एक किताब भेंट की Autobiography of a Yogi - paramhans Yogananada, उस समय तक मैं किताब नही पढ़ता था इस किताब को मैं एक बार में ही पढ़ गया, इस किताब का बहुत असर पड़ा। तभी मेरी परिचित प्रसिद्ध सूफी गायिका रागिनी रेनू ने मुझे दी मैजिक पढ़ने को दी उसके बाद Dr Brian Weiss only Love is real दी।


मेरे पास समय था मैंने सभी किताबे पढ़ ली अब किताब पढ़ने का चस्का लग गया। मैंने परमहंस योगानंद की किताब हिंदी में भी पढ़ी। उस किताब को मैं अभी तक 6 बार पढ़ चुका हूं। मुझे लगता है यदि आपने वो किताब और श्री मद भगवद गीता नही पढ़ी तो जीवन में कुछ रिक्तता है।


 उसके बाद मुझे ध्यान लगाने की प्रेरणा मिली, यूट्यूब पर कई वीडियो देखे मेडिटेशन से सम्बन्धित और जो सही लगा शुरू कर दिया 2015 में ही। धीरे धीरे ध्यान और अध्यात्म के प्रति रुझान बढ़ने लगा। 

कई बार लगा इस विषय में पहले क्यों नहीं पता लगा लेकिन जो कार्य जब होना होता है तभी होता है। लगातार किताबे पढ़ने से अब किताब लिखने का मन किया लेकिन क्या लिखे कुछ समझ नही आ रहा था। 

उस दौरान हम मुम्बई में ही थे, बेटी हैदराबाद में पढ़ रही थी। सब ठीक चल रहा था। बेटी को मिलने हैदराबाद गए तो कुछ दिन बाद ही बेटी बेहद बीमार पड़ गई। रात तीन बजे उसे लेकर हॉस्पिटल भागे। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास था कुछ नही होगा। 19 दिन बाद वो वापस घर आई। अगले दिन ध्यान में था तब एहसास हुआ जो घटना चक्र 2015 से शुरू हुआ उसकी वजह ही थी सही समय पर बेटी के साथ होना और उसका बचाव, सब पहले से लिखा था। हमें ईश्वर ने माध्यम बनाया।

तब से अध्यात्म और ध्यान का समय लगातार बढ़ता गया। अब 40 दिन के ध्यान पर आता हूं। इससे पहले भी 7 , 11 दिन के संकल्प लिए थे, 7 दिन का मौन धारण भी किया। 2022 में मुम्बई वापस आने के बाद यह सिलसिला बढ़ता गया। 

आज 40 दिन का संकल्प पूर्ण होने से बहुत शान्ति मिली। इन 40 दिनों में मैं ठीक 3 बजे उठता था एक भी सेकेंड अधिक नही। आखिरी के 10 दिनों में तो अलार्म की भी जरूरत नही रही। 3 बजे उठते ही अपने बिस्तर पर ही एक छोटे तकिए पर बैठ कर ध्यान में बैठ जाता तकिए पर बैठने का लाभ यह होता है कि आपकी कमर सीधी रहती है और आपको आलस्य नही आता।


कानों में रबड़ की दो गिटक जिन्हे ईयर बड़स भी कह सकते है लगाकर इससे पंखे की आवाज और अन्य आवाज़ों पर अंकुश लग जाता। गिटक लगाते ही दिल की धड़कन साफ सुनाई देती धक धक धक धक, रबड़ की गिटक लगाने के फायदे मैंने संदीप माहेश्वरी से सीखे अब यह मत पूछना संदीप कौन है नही पता तो यूट्यूब से पूछ लीजिए। दिल की धड़कन पर ध्यान केन्द्रित कर ध्यान लगाने का भी आनन्द अद्भुत है करिए और जानिए।

20 मिनट बाद जमीन पर पैर रखने से पहले दो मंत्र पढ़ता हूं पहला - दोनो हथेली को देखकर 

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती।

 करमूले स्थित ब्रह्मा प्रात: कर दर्शनम ।। 

दूसरा  - 

ब्रह्म मुरारी त्रिपुरंतकारी भानु शशि भूमि सुतो: बुध्श्च गुरुस्चो

शुक्र: शनि राहु केतव: कुरुवंतु सर्वे मम सुप्रभातम।

उसके बाद फ्रेशअप और आंखों पर पानी के छपाके मारना, ऐसा करना बहुत जरूरी है। 2015 में मुझे चश्मा लग गया था लेकिन तब से अब तक आंखों में पानी मारने के बाद जीभ से लार को आंखों के अंदर काजल की तरह लगाने से चश्मा कभी नही लगा। 


अपने मन्दिर के भगवान का जागरण करा कर प्रणाम करता हूं। आकाश के नीचे खड़े होकर ब्रह्माण्ड को प्रणाम करता हूं कुछ मिनट आंखे बन्द कर सुनने की कोशिश करता हूं। कभी कभी कुछ सुनाई देता है जैसे बहुत सारे लोग एक साथ बाते कर रहे है। कुछ स्पष्ट सुनाई नही देता। मैं स्पष्ट सुनने की कोशिश कर रहा हुं।

 मुझे पूर्ण विश्वास है एक दिन ऐसा होगा जब मैं कुछ स्पष्ट आवाज सुन पाऊंगा कुछ सुन पाऊंगा। मैंने सुना है कृष्ण का गीता ज्ञान ब्रह्माण्ड में गूंज रहा है। मुझे पता नही मैं इतना भाग्यशाली हूं कि उन्हें सुन पाऊं। लेकिन मुझे लगता है कुछ स्पष्ट भी सुन पाऊं तो अदभुत होगा। जब ब्रह्माण्ड के खजाने से मुझे जो सुनाई देगा वो क्या होगा क्योंकि शब्द लहरी तो स्थिर नहीं होते गतिमान होने से कौन सी भाषा कौन सा ज्ञान मुझे मिलेगा उसका बेकरारी से इंतजार है मिलेगा जरूर वो आप लोगो से साझा करूंगा।

इस धरा और ब्रह्माण्ड में अद्भुत भण्डार है इतना कि आप जितना लेना चाहे प्राप्त कर सकते है। थोड़ा आसान नही है पर असम्भव भी नहीं है। लगातार प्रयास करते रहना पड़ेगा। 

उसके बाद मैं वापस अपने कमरे में आकर दोनो रबड़ गिटक कान में लगाकर ध्यान में बैठ जाता हूं। तीन मिनट से ध्यान की शुरु हुई प्रक्रिया तीन घंटे तक पहुंच गई है । पहले 40 मिनट सिर्फ ध्यान में होता हूं। विशेष यह जब से ध्यान शुरू किया है खासकर पिछले दो वर्षो से मुझे सपने नही आते । सबकुछ साक्षात ध्यान में ही नजर आता है। 

मुझे ध्यान में ही दिखता है जो दिखना है। मुझे कई बार लगता है मैं अपने शरीर में ही नही हूं। तीन दिन पहले दो बच्चे एक लड़का एक लड़की करीब 7, 8 वर्ष उम्र के मेरे पास आए, मैंने दोनों की उंगलियां थामी और हम आकाश में उड़ चले । हम लोग करीब 15 मिनट तक ब्रह्माण्ड में रहे। वापस आते समय पृथ्वी पर पहुंचने से पहले दोनों बच्चे गायब हो गए, उससे पिछले दिन मैंने देखा मेरे सामने वाली सोसाइटी की एक बच्ची 9,10 वर्ष की व्हील चेयर पर है उसे देख मुझे अपनी बेटी भी याद आई। 

मैंने ध्यान में ही महाकाल से पूछा क्यों प्रभु इतनी छोटी बच्ची व्हील चेयर पर, मुझे महसूस हुआ मेरी बंद आंखों से जार जार आंसू बह रहे है । प्रभु मुस्कराए ध्यान से चले गए । क्या कहना चाहते थे समझ नही पाया। कई बार ऐसा हुआ ध्यान के बाद जब मैं अपनी हाथ घड़ी देखता हूं उस पर मुझे 800,1000 स्टेप हो चुके होते नजर आते है । जबकि सुबह मैं बमुश्किल 50, 100 स्टेप ही चलता होऊंगा। मैं कहां जाता हूं मुझे पता नही। 

नही आप गलत समझ रहे है मैं नींद में नही चलता कभी। मेरी पत्नी और बेटी को कभी नही लगा मैं नींद में चलता हूं। 9 बजे प्रति रात्रि निद्रा और 3 बजे उठना अब नियम बन गया है। 8 बजे मैं अपने कमरे में जाकर 11 बार मार्जरी आसन करता हूं जिसे बिल्ली गाय मुद्रा भी कहते है। उसके बाद वज्रासन पर 21 बार ॐ नांद और 21 बार अनुलोम विलोम कर 15 मिनट का ध्यान कर सोता हूं। जैसे ही अपने बिस्तर पर 9 बजे लेटता हूं। मुश्किल से 5 मिनट के अंदर नींद के आगोश में चला जाता हूं ।

सुबह 40 मिनट जो पहला ध्यान करता हुं उसमे अधिकतर आती जाती सांस पर ध्यान लगाता हूं । उस दौरान अपने आज्ञा चक्र यानि दोनो आंखों के बीच का स्थान पर कभी अग्नि लौ, कभी ॐ, कभी निराकार शिव को ले आता हूं। जितनी देर तक चाहता हूं वो प्रतीक विद्यमान रहता है।

 लेकिन अधिकतर ध्यान शून्य अंधकार निराकार भाव ही रहता है सांसों और कृष्ण कहे अनुसार नाक के अग्रभाग पर ध्यान केन्द्रित करने आता जाता रहता हूं ध्यान सीमित नहीं है इसका विशाल स्वरूप है जितना करेंगे उतने ही पैठते जायेंगे। मेरी बातें अजीब लग सकती है लेकिन वो सब वही है जो अनुभव करता रहा हूं। 

पहले ऐसा नही था बहुत संघर्ष किया अभी भी ध्यान भटक जाता है और यह सतत प्रक्रिया है। हमेशा चलती रहेगी। लेकिन एक बार जब ध्यान में आप रम जाते है तो अद्भुत आनन्द आता है। 

आप सब से भी यह प्रार्थना है शुरू कीजिए सिर्फ 3 मिनट आंखे बन्द कीजिए, कभी भी, जरूरी नही है सुबह ही, कभी भी कहीं भी, ऐसा सिर्फ 15 दिन कीजिए, विचारों का घालमेल होगा होने दीजिए, बस तीन मिनट से पहले आंखें मत खोलिए आप पायेंगे कुछ ही दिन में सुबह ही आप ध्यान करने लगे है, समय बढ़ गया है। ध्यान करने की बैचेनी बढ़ने लगी है। 

अभी तक मुझे कुण्डलिनी जाग्रति का कोई अनुभव नहीं हुआ है । कैसे होती है मैंने कोशिश भी नही की। अपने आप हो जाए तो मुझे पता नही। 

ध्यान में मुझे एहसास होता है कि मैं यानि मेरी चेतना शरीर छोड़ने लगी है और थोड़ी बहुत देर में वापस शरीर धारण कर लेती है। कई बार जब मैं बाद में इस पर गौर करता हूं तो सोचता हूं कभी ऐसा हो गया कि मेरी चेतना शरीर छोड़ गई और वापस नही आई तो ? 

तुरन्त जवाब मिल जाता है होईहि सोई जो राम रची राखा। मैं भी इस पर पूर्ण विश्वास करता हूं जितनी सांसे ईश्वर ने दी है उससे एक कम न अधिक किसी को मिली है। आना जाना नियम है जो सबको पहले या बाद में निभाना ही होगा। उसकी अब कोई चिन्ता नही होती। एक बात और आप किसी भी जाति या धर्म के हो ध्यान को कोई फर्क नही पड़ता आपको ॐ से दिक्कत हो तो आप होम का नांद करे वैसे ओम तो अद्भुत है यह शब्द ब्रह्माण्ड की ईश्वर की देन है।

ध्यान के बाद सबसे अच्छा यह हुआ कि परिस्थिति कैसी भी हो मनस्थिति एक सी ही रहे । समभाव। ऐसा ही हुआ है। चित्त शांत हुआ है। चमत्कार होते रहते है जो समय समय पर साझा करता रहता हूं। ध्यान से एनर्जी का स्तर बहुत अधिक हो जाता है मैं 3 बजे उठकर 9 बजे ही सोता हूं दिन में कभी नही सोता ना जरुरत ही महसूस हुई। कभी आलस्य आया तो 2 मिनट आंखें बन्द की कुछ गहरी सांसें ली सब कुछ ठीक, कभी बीमार नही पड़ता, कभी थकावट नही होती, जिम में 2 घण्टे पता ही नही चलता कब हो जाते है। 


चार बजे मेरा शान्त ध्यान ॐ नांद में बदल जाता है, बैठने की मुद्रा बदल लेता हूं अब पद्मासन में होता हूं ध्यान सुखासन में करता हूं। मैं 108 मनको की माला से लम्बे गहरे ॐ नांद करता हूं, पहले तो नही लेकिन अब ॐ नांद नाभी क्षेत्र यानि मणिपुर चक्र से प्रारम्भ होते है, ॐ प्रतीक लगातार आज्ञा चक्र पर विद्यमान रहता है। इसके बाद 108 बार अनुलोम विलोम करता हूं। कोशिश यही रहती है इस बीच ॐ प्रतीक आज्ञा चक्र पर स्थिर रहे। अधिकतर सफल रहता हूं।

एक घंटे में ॐ नांद और अनुलोम विलोम करने के बाद 15/20 मिनट अपने पैर दीवार पर कमर से ऊपर रखता हूं इस क्रिया को विपरीत करणी या लेग्स अप वॉल पोज भी कहते है। इस योग की सबसे बड़ी खूबी है खून का विपरीत दिशा में दौरा होता है इस योग के फायदे आपको यूट्यूब पर मिल जायेंगे। इस योग को करने के बाद जरूरी है 5 मिनट का शवासना योग करना जिससे खून का दौरान वापस प्राकृतिक रूप में आ जाए।

इसके बाद 20 मिनट के व्यायाम 20 मिनट श्री मदभगवद गीता पाठ और 20 मिनट कुछ पढ़ता हूं।

यदि परिवार का सहयोग न मिले तो आप कुछ भी नही कर सकते ध्यान अध्यात्म भी नही, मैं खुशनसीब हूं मुझे पत्नी और बेटी का पूरा सहयोग है हो सकता है उन्हे कई बार लगता होगा यह सब ज्यादा हो रहा है लेकिन वो कुछ कहते नही, ना चाहते हुए भी तारतम्य बना लिया है, पहले हम तीनो साथ में रात में कोई फिल्म देखते या रात्रि भोज पर बाहर जाते थे वो मेरे कारण बन्द हो गया है। यदि मैं देर तक जागता हूं तो मेरा अगला दिन व्याधित होता है। मेरा साधुवाद है परिवार को।

मुझे पता है आप लोग इतनी लंबी पोस्ट पढ़ने सुनने के बाद इन्तजार कर रहे होंगे सबसे जरूरी बात आर्थिक रूप से क्या लाभ होता है ध्यान से। मैं बताता हूं। मैंने लाखों रुपए से लोगों की मदद की मदद नही यह शब्द मुझे अच्छा नहीं लगता मदद सिर्फ ईश्वर कर सकते है। आप सिर्फ सहयोग कर सकते है। 

यदि मैं हिसाब लगाऊं तो करीब 2करोड़ रूपये होंगे जो मुझे लेने है लोगो से जिनको सहयोग किया, लेकिन वो सब मित्र परिचित परिस्थित वश नही दे पा रहे है। ऐसे में पहले दिक्कत होती थी चिंता होती थी। लेकिन लगातार ध्यान करने के बाद चिन्ता खत्म हो गई। यह समझ आ गया चिन्ता या परेशान होने से पैसे आने से रहे। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है आज नही तो कल सारे पैसे ब्याज सहित वापस आयेंगे l 

ध्यान लगाने से आर्थिक रूप से कोई जरूरी काम रुकेगा नही। समय एक सा नही रहता आर्थिक समस्याएं भी आती है लेकिन मुझे लगता है यह ध्यान का कमाल है मित्र परिचित परिवार आपकी मदद को तैयार रहते है मेरे साथ तो ऐसा ही होता है जरूरत पड़ने पर जिससे भी मदद मांगी कभी न सुनने को मिली। आप सोच रहे होंगे मदद तो अच्छा शब्द नही है मैंने ऐसा लिखा लेकिन जब आप कुछ मांगते है तो मदद सही शब्द है लेकिन जब आप किसी की समस्या का समाधान करते है तो सहयोग ही अच्छा शब्द है। 

ध्यान करने से आर्थिक सम्पन्नता भी आती है यह पक्का है यह आपके कर्मा पर निर्भर है, समय जल्दी या देर से उसी पर निर्भर है । ध्यान मदद जरूर करता है यदि आपको कुछ समझ नही आ रहा पैसे की बहुत जरूरत है आपको यह भी समझ नही आ रहा किससे मांगे तो भगवान पर विश्वास रखे और ध्यान में ब्रह्माण्ड से मांग ले महाकाल आपकी मदद करेंगे अवश्य करेंगे। मेरे साथ तो ऐसा ही होता है लोग मदद करते है ब्रह्माण्ड और महाकाल हमेशा मेरे साथ होते है । आप भी प्रयास करे विश्वास करे निराश नहीं होंगे।

जल्द ही ऐसा समय आयेगा आप पूर्ण कर्ज मुक्त होंगे आपका अपना मकान होगा गाड़ी होगी सबसे जरूरी शान्ति सुकून मिलेगा। आपका दिन शुभ हो। नमस्कार 

समय समय पर आपके साथ अपने अनुभव इस तरह की जानकारी आप तक पहुंचाता रहूंगा। आपका कोई प्रश्न हो तो बताएं कोशिश होगी सही उत्तर दे पाऊं नही देने की स्थिति में होऊंगा तो महाकाल के पास अर्जी लगा दूंगा आपको सीधा जवाब मिल जायेगा यह निश्चित है।


हरीश शर्मा



Monday, April 4, 2022

कश्मीरी पंडितों की पीड़ा और न्याय

कश्मीरी पण्डितों की पीड़ा और न्याय

यह निहायत ही बचकानी बात होगी कि कश्मीरी पंडित जिन पर जुल्म हुए और मजबूरी में उन्हें पलायन करना पड़ा अब 32 सालों बाद उनमें से बहुत बड़ा प्रतिशत बहुत खुशहाल व्यवस्थित स्थापित है। मुझे नही लगता अब सब कुछ अपनी मेहनत मशक्कत से पाने के बाद देश विदेश के विभिन्न हिस्सों में रहे कश्मीरी हिन्दू वापस कश्मीर जा कर बसेंगे। तो क्या पण्डितों उनको इंसाफ नही मिलना चाहिये ?

कश्मीर फ़ाइल फ़िल्म ने मीडिया के हर क्षेत्र में ऐसी बहस चर्चा का आगाज किया है कि अखबार टीवी यूट्यूब डिजिटल मीडिया हर जगह सिर्फ और सिर्फ पंडितों की बात हो रही है पक्ष में या फ़िल्म के विरुद्ध। फ़िल्म को प्यार करिये या नफरत लेकिन आपको पंडितों से जोड़ा जरूर है। 

बातें बहुत हुई अब समाधान होना चाहिए समाधान की बात बहुत अधिक हुई नही। सबसे पहला समाधान होना चाहिए जो कश्मीरी पंडित सालों से जम्मू कश्मीर में टेंटो में रह रहे है हम केन्द्रीय सरकार को यह हक देते है कि वो उनके लिये एक ही स्थान पर पक्के 3 बीएचके फ्लैट बनाकर दे। हक देने से मतलब है सरकार हमारा पैसा पंडितों की भलाई के लिए लगाये। उनके बच्चों की पूर्ण शिक्षा बिल्कुल फ्री हो। 

सरकारे दो साल से 80% गरीब परिवारों को फ्री राशन दे रही है अब उस पर अंकुश लगना चाहिए और व्यवस्था होनी चाहिए जो वास्तव में जरूरतमंद हो उसे ही फ्री राशन मिले। टेंटो में रह रहे पंडितों को फ्लैट के साथ अगले 10 वर्षो तक फ्री राशन, नोकरी या उन्हें पैरों पर खड़े करने का प्रयास करे। वैसे मैं फ्री की सौगात के पक्ष में बिल्कुल नही हूँ शायद पण्डित भी न हो । लेकिन जरूरतमंद को सुविधा मिलनी चाहिए।

देश विदेश में रह रहे पण्डितों के पुशतैनी मकानों पर उन्हें कब्जा दिलाया जाये और उन मकानों के पुनर्निर्माण के लिए उचित मुआवजा दिया जाये। यह निश्चित है कि अब जीवन में मुक़ाम हासिल कर चुके पण्डित पुनः कश्मीर में बसने से रहे। ख़ासकर आज की पीढ़ी तो कदापी स्थापित होने के लिए नही जायेगी । लेकिन साल में एक या दो बार पण्डित अपने पुश्तैनी मकानो में जाकर जरूर खुशी मनायेंगे एकत्र होकर जश्न मनायेंगे। वो अपने पुश्तैनी मकान का कुछ भी करे उन्हें पूरा हक हैं।

हालाँकि अभी भी श्री नगर में स्थिति बहुत अनकूल नही है। कश्मीरी पण्डितो की सुरक्षा  सबसे बड़ा धर्मसंकट है। फिर क्या कश्मीरी हिन्दुओं की जमीन जायदाद पर कब्जा जमा चुके लोग थाली में परोस कर तो वापस करने से रहे। इसके लिये सरकार को संकल्प लेना होगा। कठिनाईयां है लेकिन असम्भव कुछ नही सरकार ठान ले तो क्या नही कर सकती । 370 और 35 ए भी तो इसी सरकार ने हटाया  है। 

अब मुद्दा जिम्मेवार कौन वी पी सिंह भाजपा सरकार, फ़ारुख़ अब्दुल्ला, जगमोहन या अन्य सरकारें ?

वी पी सिंह का तो एजेंडा ही कुछ और था कांग्रेस मानसिकता से आये वीपी समाज में ऐसी खाई पैदा कर गए जिसका खामियाजा अगले 100 सालों तक भुगतना पड़ेगा। उनका वो एजेंडा पूरा हुआ। वैसे भी वीपी सरकार को आये कुछ समय ही हुआ था न उनकी सामर्थ्य थी न इक्छा शक्ति इसीलिए कुछ समय बाद हमेशा के लिए उनका पतन हो गया। उन्होंने क्या कमाया सिवाय बदनामी के।

भाजपा बाहर से वीपी सिंह को समर्थन दे रही थी बाहर से समर्थन देने वाली पार्टी किसी तरह का निर्णय लेने में कतई सक्षम नही होती। ऐसी सरकारों का चलना या घिसटना ही मुश्किल से होता है। हाँ भाजपा चाहती तो पंडितों के मुद्दों पर खुद को अलग कर सकती थी। लेकिन उस समय क्या परिस्थिति थी क्या इस स्थिति में थी कि उनकी बात सुनी जाती। 

फ़ारुख़ अब्दुल्ला की भूमिका पर साज़िश के तहत जाँच होनी चाहिए। 19 जनवरी1990 को कश्मीरी पण्डितों का कत्लेआम होता है उन्हें इस कदर डराया धमकाया जाता है कि 4-5 लाख लोग रातों रात अपनी जान इज्जत आबरू बचाने के लिए मजबूरी वश कश्मीर छोड़ने पर विवश हुए 18 जनवरी 1990 को फ़ारुख़ अब्दुल्ला मुख्यमंत्री स्तीफा देते है जिनके कार्यकाल में 19 जनवरी को कत्लेआम करने वालों को सह मिलती रही थी। 

क्या ऐसा सम्भव है कि एक दिन पहले तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले फ़ारुख़ को पता ही ना हो कि कल क्या होने वाला है। सोची समझी साजिश के तहत फ़ारुख़ स्तीफा देकर चुप्पी साध लेते है। उनकी हिम्मत नही होती कि वो कत्लेआम और पण्डितों के साथ हुए अत्याचार पर कोई बात कह सके। यानि वो पंडितों पर हुए हत्याचार और अत्याचार में बराबर के भागीदार है और इसकी सजा उन्हें मिलनी चाहिए। 

याद रहे जब कश्मीरी पंडितों की हत्या और अत्याचार होना शुरू हुए थे उस समय दिल्ली में राजीव गाँधी और कश्मीर में फ़ारुख़ अब्दुल्ला की सरकार थी आतंकवाद चरम पर था उस पर नकेल कसने के ठोस प्रयास नही किये गये । आतंकवादियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वो जब चाहे किसी को कत्ल कर दे अगवा कर ले बलात्कार कर दे शरीर को चीर दे, कत्ल कर मृतक पंडित के चारो तरफ जश्न मनाये। 

आप कह और सोच सकते है कि सेना तो उस समय भी थी वो कुछ क्यों नही कर पा रही थी। उसकी वजह थी कि आज की सरकार की तरफ़ से कड़े फैसले लेने की छूट उस समय आर्मी को नही थी। आज जैसे आतंकवादियों को तुरंत हलाक करने में समय नही लगता वैसा उस समय की सेना को छूट नही थी। आर्मी के हाथ बंधे थे। वरना भारत की सेना के सामने किसी आतंकवादी की क्या मजाल जो सप्ताह भर से अधिक जीवित रह जाये। जैसा आज होता है सेना उस समय भी वैसी ही थी जैसी आज है। 

जगमोहन ने कश्मीर के राज्यपाल के रूप में अपने पहले कार्यकाल में कश्मीर का कायापलट किया था जो विकास किया था उसके मुरीद आज भी कश्मीर के हर वर्ग में मिल जायेंगे। 

दूसरा कार्यकाल उनका 19 जनवरी 1990 की रात जम्मू पहुँचने से हुआ था कश्मीर के सभी आलाधिकारी उनकी जी हजूरी में जम्मू पहुँचे हुए थे राज्यपाल जगमोहन को 19 को ही श्रीनगर पहुँचना था लेकिन बर्फवारी और खराब मौसम के चलते वो न हवाई न जमीनी मार्ग से श्रीनगर पहुँच पा रहे थे । जम्मू में बैठकर उन्होंने केन्द्रीय सरकार पर सख़्त कार्यवाही करने का दबाब डालने की कोशिश की लेकिन दिल्ली में बैठे हुक्मरान समझ ही नही पाये कि पंडितों पर कत्लेआम अत्याचार जुल्म इतना भयानक हुआ है या उन्होंने समझने की जरूरत ही नही समझी।

फिर उस समय आज की माफ़िक डिजीटल माध्यम भी नही था कि खबर खबर से पहले पहुँच जाये। 

32 साल या दो पीढ़ी का समय क्यों लगा पंडितों की पीड़ा को समझने और कश्मीर फ़ाइल के माध्यम से देश की प्रतिक्रिया मिलने में ?

दरअसल कश्मीर फ़ाइल अभी के काल खंड में बनने और रिलीज होने में वर्तमान सरकार में ही सम्भव था। पिछले 32 वर्षों में पहली बात तो इस तरह की फ़िल्म बनती नही बन जाती तो रिलीज ही नही हो पाती। वजह कांग्रेस और भाजपा की अटल सरकार मिली जुली सरकारें थी मिली जुली सरकारें पण्डितों पर हुए हत्या-अत्याचारों पर कोई ठोस फैसले लेने की स्थिति में नही थी। उन्हें किसी तरह अपनी सरकार का कार्यकाल पूरा करना था। 

आप सोचिए कश्मीर फ़ाइल के विरोध में आज कितने लोग उठ खड़े हुए है यदि ऐसा पहले होता तो विरोध करने वाले पण्डितों पर हुए अत्याचार को नया ही रंग दे देते। 

आज विरोध करने वालो की आवाज़ इसलिये कमजोर लग रही है क्योंकि कश्मीरी पण्डितों के पक्ष में पूरे देश ही नही विदेश में भी आवाज़ इतनी जोर से बुलंद हुई है कि सच सामने आ गया है सच को आप कुछ समय के लिए दबा सकते है इतिहास को साजिश के तहत तोड़ मरोड़ सकते है लेकिन सच और वास्तविक इतिहास समयानुसार अपना रंग दिखाते जरूर है। पण्डितों के सच और इतिहास के रंग की रंगत दिखाने में 32 साल लग गये लेकिन रंग बड़ा चोखा आया है।

कश्मीर से बहुत अलग नही है बंगाल की त्रासदी 

उदाहरण के लिए मैंने मेरे से पहले और बाद की पीढ़ी ने कश्मीरी पंडितों के विषय में पढ़ा जरूर लेकिन गम्भीरता को नही समझ पाये ठीक वैसे ही जैसे कि बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा बल्तकार आगजनी और पलायन को नही समझ पाए सोचिए आज हर तरफ मीडिया सोशल मीडिया टीवी मीडिया मोबाइल मीडिया होने के बाद भी दिल्ली मुम्बई या देश के अन्य हिस्सों में रह रहे लोग बंगाल की पीड़ा नही समझ पाए तो 32 साल पहले के कत्लेआम पलायन की पीड़ा कैसे समझ पाते, कश्मीर फ़ाइल की तरह ही जब कभी बंगाल के पीड़ितों पर फ़िल्म बनेगी तब हम आम जन उनकी पीड़ा को समझ पाएंगे।

वापस कश्मीर पर आते है 

प्रश्न यह है कि मोदी सरकार 7 साल क्या कर रही थी पण्डितों को न्याय देने के लिए क्या वो कश्मीर फ़ाइल का इंतजार कर रही थी ?

प्रश्न बहुत सटीक है इसे ऐसे समझिये पहले कार्यकाल में सम्पूर्ण जनादेश वाली सरकार थी और देश को उनसे बहुत उम्मीदें थी। चुनोतियाँ बहुत थी पूरा विपक्ष एकजुट होकर भाजपा पर बेमतलब का दबाब डालने की कोशिश कर रहा था। भाजपा विभिन्न प्रदेशों के चुनावों को जीत कर खुद को और मजबूत करने के सफल प्रयास कर रही थी, 

पण्डितों को न्याय का विचार प्रधानमंत्री के दिमाग में हमेशा था और होगा वो इन्तजार कर रहे थे सही समय का, कश्मीर फ़ाइल ने राहे आसान कर दी है अब पूरी दुनियां पण्डितों के साथ है । 

सरकार क्या कर सकती है समाधान शुरू में बताए है लेकिन सरकार में बैठे लोग और प्रधानमंत्री मुझसे कहीं बेहतर कार्यवाही करेंगे ऐसी उम्मीद कश्मीरी हिंदुओं को और इस देश को उनसे है।

सबको पता है प्रधानमंत्री अपने औचक निर्णयों से सबको आश्चर्य में डालते रहे है। 370 और 35 ए ऐसे ही निर्णयों की बानगी है ।

दोषियों को सज़ा मिलना भी जरूरी है। उस समय से अभी तक हमें यह समझाने की कोशिश होती रही है कि कश्मीरियों पर जुल्म पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने किया था यह सच हो सकता है लेकिन स्थानीय कश्मीरी मुसलमानो की सहभागिता थी प्रतिशत कम बढ़ हो सकता है।

बहुत से लोग और गुलामनबी आज़ाद कह रहे है पूरा सच नही दिखाया गया फ़िल्म में । क्या दिखाते कश्मीरी मुसलमान आतंकवादी बनकर कश्मीरी मुसलमानों को मार रहे है। फिर यदि किसी को गिलास आधा भरा या आधा खाली लग रहा है तो लोग आज़ाद है अपनी बात रखने के लिए फ़िल्म बनाये पूरा सच दिखाए। केजरीवाल की मदद भी ली जा सकती है। फ़िल्म बनने के बाद केजरीवाल के सहयोग से उस फिल्म को यूट्यूब पर भी फ्री डाल सकते है। फ़िल्म की लागत तो गुलाम फ़ारुख़ केजरीवाल  महबूबा मुफ्ती से मिल ही जायेगी। फ़िल्म भी झूठी नही होगी।

यही समय है कि गोधरा कांड, 1984 के दंगे, पंजाब आतंकवाद, इमरजेंसी जैसे विषयों पर भी फ़िल्म बननी चाहिए। इतिहास सजग चुस्त दुरुस्त रहना चाहिए। 

तुरन्त प्रश्न आ गया गुजरात दंगों पर क्यों नही । बिल्कुल बननी चाहिये फिल्मकारों को आगे आना चाहिए सच दिखाना चाहिये। गोधरा पार्ट 1 और गुजरात दंगे पार्ट 2 भी बनायी जा सकती है। सुझाव दे दिया है अमल करें।

हरीश शर्मा


Wednesday, March 16, 2022

प्रमोद सावन्त जी - गोआ के सामने बेहतरीन मौका है

                   गोआ का सामने बेहतरीन मौका है


भाजपा फिर से गोआ में सरकार बना रही है। प्रमोद सावंत करिश्माई मुख्यमंत्री नही है हम सबके बीच के ही लगते है सरल सपाट बोलने वाले। गोआ की जीत में भाजपा के साथ प्रमोद सावंत को भी श्रेय मिलना चाहिये। चुनाव से पहले के 4-5 महीने आसान नही थे सरकार में 4.6-8 साल मलाई खाने वाले कई मंत्रियों और विधायकों ने पार्टी छोड़कर अपने अपने उल्लू सीधा करने की कोशिश की। 

यह ठीक है कि ममता बनर्जी की टीएमसी केजरीवाल की आप ने भाजपा की राह आसान बनाई । कांग्रेस का नुकसान अधिक बड़ा हुआ। 


मुझे याद है अपने 3 साल के गोआ प्रवास के दौरान मैं देखता था प्रमोद सावंत से अधिक मीडिया में माइकल लोबो के बतौर मन्त्री  बयान छपते थे प्रमोद सावंत के कम । कई बार लगता था लोबो मुख्यमंत्री या सावंत। लेकिन सावंत की चोट सही समय पर होती थी लोबो को रोज छपने के चस्का था । लोबो के समीकरण गड़बड़ा गये नही तो वो फिर मंत्री बनते। मुझे उम्मीद है अब भाजपा उन्हें किसी भी स्थिति में वापस नही लेगी। 

वैसे फतोरदा के विधायक विजय सरदेसाई सबसे अधिक छपने वाले नेता थे ऐसा मुझे लगता था । सरकार का कोई भी बयान आये उसका विरोध बयान अगले दिन अखबारों में होता था। उन्होंने मीडिया पर अच्छा प्रभाव कायम किया था। अपनी सीट निकालने में वो माहिर है उनका गठबंधन भी काम नही आया। वह महत्वाकांक्षी नेता है लेकिन पत्ते सही पड़ नही रहे।

कॉंग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिगम्बर कामथ ने मडगांव में अच्छी पैठ बना रखी है भाजपा उनका तोड़ नही तलाश कर पाई है। 

इस बार करीब पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है प्रमोद सावंत को निर्णय लेने में आसानी होगी । पिछली सरकार में कांग्रेस से टूटकर आये विधायकों का दबाब रहता था उनमें सेकुछ मन्त्री भी बने थे जिनके अपने हित थे। 


गोआ में तीन साल रहने के दौरान मैंने पाया गोआ एक विश्व प्रसिद्व पर्यटन राज्य बन सकता है। लेकिन उसके लिये अगले छह महीनों में ही कड़े निर्णय लेने पड़ेंगे । शुरू में इसलिये कि जिन निर्णयों की बात में कर रहा हूँ उनका परिणाम अगले दो वर्षों में दिखने लगेगा।

पहला और सबसे कठिन  निर्णय है स्थानिय टैक्सी यूनियन की दादागिरी को खत्म करना मैं जानता हूँ यह बहुत ही अधिक कठिन निर्णय है लेकिन कभी न कभी तो लेना ही पड़ेगा। प्रमोद सावंत को तमाम निजी टैक्सी कंपनियों को गोआ में शुरुआत करने की इजाजत देनी पड़ेगी। ओला ऊबर के गोआ आते ही गोआ का पर्यटन 40-50% बढ़ जायेगा। 

स्थानिय टैक्सी माफ़िया ऐसा न होने देने के लिये सारी हदे पार कर सकता है। हड़ताल कर गोआ को बंधक बना सकता है । गोआ माइल्स को शुरू करने की दिक्कत प्रमोद सावंत से बेहतर कौन जानता है। लेकिन उन्हें शायद यह नही पता होगा कि गोआ माइल्स ने भी प्राइवेट टैक्सियों की माफ़िक ही पर्यटनों को लूटना शुरू कर दिया है। 

उनकी जानकारी के लिये बता दूं अब आप गोआ माइल्स की टैक्सियों को सुबह 8 से 11 और शाम को 5 से 7 बजे तक के बीच नही पायेंगे यह सभी टैक्सियां प्राइवेट टैक्सियों की तरह ही काम करती है मान लीजिये आपको कोलवा से मडगांव रेलवे स्टेशन जाना है तो इस 6 किलोमीटर के प्राइवेट टैक्सी लेगी 650 रुपये, गोआ माइल्स की एप्प पर नजर आयेगा 170 रुपये करीब लेकिन टैक्सी मिलेगी नही कम से कम 2 घण्टे तक । लेकिन यदि आपके पास गोआ माइल्स के ड्राइवर का डायरेक्ट नंबर है तो वो आपसे 300-400 रुपये लेकर पहुँचा देगा। यही पर यदि ओला ऊबर होगी तो आप करीब 100 रुपये में यह सफर पूरा कर सकते है। 

टैक्सी यूनियन की दादागिरी का अंदाज इस बात से ही लगा सकते है कि गोआ माइल्स की टैक्सी किसी होटल के इर्दगिर्द भी नजर आ गई तो ड्राइवर को पिटना ही है। वजह उसकी हिम्मत कैसे हो गई हमारे क्षेत्र में घुसने की।

यह ठीक है कि ओला ऊबर आने से स्थानिय टैक्सी वालो की मेहनत बढ़ेगी स्पर्धा भी बढ़ेगी लेकिन उन्हें सोचना चाहिये कि गोआ का अद्भुत विकास होगा जिसका लाभ गोआ वासियो को ही मिलेगा।

तो सावंत जी यह निर्णय लीजिये इस निर्णय से पर्यटन का इतना विकास होगा जिसकी कल्पना भी नही कर सकते आप। 

दूसरा अमूल चूल परिवर्तन करना है आपको गोआ के नेटवर्क में सुधार करने का। एक भी मोबाइल कंपनी का नेटवर्क ऐसा नही है जो सही से कम करता हो। हम साउथ गोआ रहते थे देश मे काम करने वाली किसी भी कम्पनी की इंटरनेट सेवा यहाँ उपलब्ध नही है। एयरटेल, जिओ, टाटा, ज़ी कोई नही । प्राइवेट स्थानिय कम्पनियों के रेट इतने अधिक है कि क्या बताऊँ। हम 1400 रुपये महीना देते थे साथ ही बीएसएनएल इंटरनेट सेवा भी ले रखी थी 800 रुपये महीने में कि एक नेटवर्क खराब हो जाये तो दूसरा काम आ सके। प्राइवेट वाला 5-7 दिन तो खराब रहता ही था। 


स्थानिय लोग किसी भी नेटवर्क को घुसने ही नही देते उनका मानना है मोबाइल टॉवर लगने से ग्लोबल वार्मिग की शिकायतें बढ़ेंगी प्रदूषण बढेगा। हालाँकि कई बार मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि बहुत से टॉवर लगाने की इजाजत दी गई है और सभी टॉवर सरकारी जमीन पर लगेंगे। हमनें तो सिर्फ बयान ही पढ़े टॉवर या कोई सुविधा तो देखी नही।

जितने भी बीच है उनका सौंदर्य करण और पर्यटकों को सुविधा के तमाम इंतजाम करने की संभावना हमेशा है इसके लिये मुख्यमंत्री को किसी विदेशी बीच को देखना चाहिए। इससे उन्हें आइडिया लगेगा कि क्या नया किया जा सकता है। मैंने अपनी न्यूज़ीलैंड यात्रा के दौरान वहाँ के बीच के सौंदर्यीकरण ओर सुविधाओं को देखा था वो अकल्पनीय था। 

पणजी में माण्डवी नदी में खड़े कई कैसिनो शिप को कहीं ले जाने की बात पिछले कई सालों से पढ़ता रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है स्थिति यहीं रही तो बहुत जल्दी यह कैसिनो स्वतः ही बंद हो जायेंगे उसकी वजह है एंट्री फीस के रूप में ली जाने वाली रकम जो 3 से 6-7 हज़ार तक है। आज के डिजिटल युग में एंट्री फीस का कोई मतलब नही है पचासियों कैसिनो खेल आपके मोबाइल पर उपलब्ध है जो फ्री में है और उनकी तमाम लुभावनी स्कीम भी लगातार आती रहती है। सरकार और कैसिनो मालिकों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिये यह ठीक है इन कैसिनो से बहुत अधिक रेवेन्यू सरकार को मिलता है लेकिन उसका लाभ पर्यटकों को भी मिलना चाहिए। जहाँ तक मुझे याद है विदेशों के कैसिनो में एंट्री फ्री नही है। 


गोआ के लोगो को बहुत अधिक विकास पसन्द नही है मुझे याद है एक मेडिकल कालेज खुलने का इतना अधिक विरोध गाँव वालों ने किया कि उसे कही और ले जाना पड़ा। वो अभी तक अधर में ही है। 

रोजगार की समस्या हमेशा से किसी भी सरकार के लिये सबसे बड़ी समस्या है लेकिन गोआ के लिये अन्य सरकारों से भी बड़ी है। cag के मुताबिक गोआ सरकार पर करीब 23 हज़ार करोड़ से अधिक का कर्ज है । कमाई का सबसे बड़ा साधन mining पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा रखा है जिसकी कमाई को गोआ की life line कहाँ जाता है। केन्द्रीय सरकार के हस्तक्षेप के बाद कुछ सम्भवनाये बन सकती है लेकिन पिछले कुछ सालों से कुछ हुआ नही। 

गोआ को आसानी से आई टी का बेहतरीन क्षेत्र बनाया जा सकता है लेकिन स्थानिय लोग ऐसा होने नही देंगे वजह वही प्रदूषण । सबको सरकारी नोकरी चाहिए सरकार चाह कर भी ऐसा करने की स्थिति में नही है कर्ज में डूबी सरकार अन्य लोगो को नोकरी देकर अपने कर्ज में इज़ाफ़ा ही करेगी। गोआ के लोगो को चिन्ता इसलिये भी बहुत अधिक नही है कि पंजाब की तरह यहाँ भी अधिकतर परिवारों में एक दो जन विदेशों में स्थापित है। रही सही कसर टैक्सी से पूरी हो जाती है कई परिवार ऐसे है जिनके पास 8-10 टैक्सी होना साधारण बात है।


नोकरी की चिन्ता बहुत नही है यहाँ यदि वो होती तो प्रदूषण के नाम पर हर चीज में व्यवधान न पैदा करते। 


उत्तर गोआ और दक्षिण गोआ के आवागमन को आसान बनाने के लिए सरकार को गोआ मैट्रो के लिए कोशिश करनी चाहिए अभी से शुरू करने की माँग करेंगें तो 5 - 7 साल तक ऐसा होना सम्भव होगा लेकिन समस्या वही आयेगी स्थानिय लोगो का विरोध।

हरीश शर्मा 

मुम्बई से।




Monday, January 17, 2022

साधारण बुखार की कोई इज्जत ही नही है -

नार्मल बुख़ार की कोई इज्जत ही नही 

कुछ दिन पहले रेल से मुम्बई जाना हुआ चूँकि पलावा सिटी जाना था इसलिये रेल से पास पड़ता। ac डिब्बे अधिक ठंडे थे या ठंड अधिक थी इसलिए ठंडे थे पर थे मैं हमेशा की तरह सफर में short और टी शर्ट में था। पलावा में भी ठंड थी रेल के ac डिब्बे से भी अधिक। 

फुल बाजू के कपड़े ले नही गया था लिहाज़ा ठंड लगती रही हम इस उम्र में उम्र को एक नम्बर ही है मानते रहे।

हाँ कॅरोना के सारे precautions मापदंडों पर कोई समझौता नही किया। 3 दिन  बाद वापस आ गये सही सलामत।

आने के अगले दिन सुबह 6.30 बजे ही walk पर चला गया गोआ में सुबह की मस्त ठंड है उस पर भी गौर नही किया एक घण्टे की walk 1 घण्टा exercise की उम्र क्या है एक नंबर ही है

ठंड लग रही थी शरीर को लेकिन मन को मजबूत करते हुए मानने को तैयार नही था मैं। अगले दिन 1 घण्टा walk की जगह दौड़ लगा दी। उम्र क्या है नम्बर है इस 29 जनवरी को मात्र 58वें वर्ष में प्रवेश कर जाऊँगा ।

न न बधाई लेने के लिए नही लिख रहा वो तो 29 को फेसबुक देखने वाले कर ही देंगे जो 30 या बाद में देखेंगे कर देंगे। सामाजिक मीडिया का यह ही आंनद है अपने जन्मदिन को 8 - 10 दिन तक check करते रह सकते है।

मुद्दे पर वापस आते है दौड़ने वाले दिन शाम तक ठंड इतनी अधिक लगने लगी तो पंखा बन्द कर दिया और नौ बजे तक बिस्तर में। पहले एक चादर फिर दूसरी खेस नुमा चादर,खेस मोटी चादर को कहते है आज की पीढ़ी के लिए पता होना जरूरी है । 

थोड़ी देर में पंखा बन्द कर दिया और पतली रजाई भी आ गई नीचे वाले कमरे के पैसे वसूलने का जैसे समय आ गया था हम डुप्लेक्स में रहते है ना ना अमीर नही है हम, गोआ में मकान सस्ते ही है। 

तो अब अगला क्या मीनाक्षी बोली अरे कुछ नही उम्र का तकाजा है ठंड लग गई है बेटी ईहा ने फरमान जारी किया मैंने check किया है विक्टर हस्पताल में 1500 में कोविड टेस्ट हो जायेगा घर पर आकर करेंगे तो 4500 लगेंगे। अभी तक लग नही रहा था इसलिए बुखार check ही नही किया था। बेटी के फरमान को ok कर दिया कि जाऊँगा 4500 से 1500 ही भले गोआ माइल्स से आने जाने में करीब 500 रुपये लगेंगे। यदि वो नही मिली दादागिरी टैक्सी से जाना पड़ा तो करीब 1500 लगेंगे।

तीनों के चेहरे पर मास्क आ गये बिना मास्क के सिर्फ कुल्फी रह गई वो हम लोगो को आश्चर्य से देख रही थी सोच रही होगी तीनो डॉक्टरों की तरह क्यों लग रहे है। रात को शरीर दर्द करने लगा सिर में भी हल्का दर्द था सुबह उठा तो शरीर ने साथ ही मन ने कही आने जाने से मना कर दिया। हां थोड़ी देर धूप में बैठा तो आराम मिला।

फिर बिस्तर में, पाठ, अनुलोमविलोम ॐ और ध्यान सब किया मुझे हमेशा लगता है इनकी शक्ति से अधिक कुछ नही, हिम्मत करके एलान कर दिया आज देखते है ठीक नही हुआ तो कल जाऊँगा टेस्ट कराने। बेटी नाराज हुई बेटिया होती ही ऐसी है पापा को कुछ न हो जाये। यदाकदा ही देख है पापा को बीमारी में लेटे।

बैद्य जी की बेटी मीनाक्षी की सेवा शुरू हो गयी थी खिचड़ी, तुलसी गर्म पानी हल्दी वाला दूध आदि, अभी तक किसी अन्य को नही बताया था बेटी ने nephew अक्षत को बताया तो लल्ला ने पूछा रिनी की बात क्यो नही मान रहे। मैंने कहा मान तो रहा हूँ कल जाऊँगा। हाँ डॉक्टर ईहा ने डोलो का कोर्स शुरू करा दिया था और बैध मीनाक्षी ने बैधनाथ की महासुदर्शन बटी शुरू करा दी। 

इतनी देर तक लेटने की आदत न होने के कारण बोरीयत होने लगी यहाँ काम आये कपिल शर्मा अरे कपिल से बात नही की उनके शो देखे तो खूब हंसा। कभी कभी न्यूज़ भी देखी लेकिन कोई स्वाद वहाँ नही आया। हाँ मेरा स्वाद और सूँघने की शक्ति बरकरार थी मैं तो अपने हाथ को ही सूंघ लेता हूँ।

अब लगा मेडिकल पेशे से जुड़े बहनों को इतल्ला करनी चाहिये msg कर दिया भाई ने, दूर देश आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड में रह रही बहनों के बेचैन वीडियो फोन आ गये क्या हुआ कैसे क्यों। क्या दवाई ली आदि बुखार अभी तक 101 था उतरा नही था। 

इधर भाई सुशील ने अम्मा को बता दिया उनका तो सीधा सा उत्तर अरे सब ठीक होगा चिन्ता मत कर। 

खैर जी रात गुजर गई। सुबह लगा ठीक हूँ नहा लिया हल्कापन लगा। दीदी से बात हुई बोली covid testing kit मंगा कर टेस्ट करो। मैंने पूछा वो सही परिणाम देता है क्या। वो बोली इंग्लैंड में सनी बेटे के पूरे परिवार को करोना हुआ था तब हस्पताल ने कुछ किट देकर बोला था आने की जरूरत नही घर में test करो इलाज करो।

मैंने बोला मीनाक्षी को तो जैसा हमारे यहाँ होता है वहाँ की बात और है उन्होंने बेटी को बताया तो वो नाराज़ तो हुई माँ के सामने लेकिन किट मंगा ली।

पलावा में हम मित्र अजीत कोहली के यहाँ रुके थे लगा उन्हें बताना चाहिए msg किया तो फोन आ गया बोले पक्का कॅरोना होगा लेकिन दोनों डोज लगी है तो चिन्ता मत करिए। मेरे पापा बहन के घर में भी सबको हो गया है। 
 
थोड़ी देर में किट आ गई किट के निर्देशानुसार एप्प डाऊनलोड कर नाक में ड़ालने वाली रुई स्टिक दी गई उसे एक तरल पदार्थ में डाला गया । अब 15 मिनट में परिणाम आना था । मुझे तो पता था परिणाम negetive ही आना है।  15 मिनट बाद बेटी ने आकर मास्क के अंदर से मुस्कराकर कहा बधाई निगेटिव है रिपोर्ट । मीनाक्षी ने तो जैसे जंग जीत ली हो।

रिपोर्ट बहनों भाई और अजीत को भेजी गई सबका बधाई msg आया। 

दीदी ने msg किया नार्मल बुखार की तो कोई इज्जत ही नही है अब । थोड़ी देर में बुखार check किया तो 100 था और तीन घण्टे बाद गायब हो गया था तब से अगले दिन अभी लिखने तक नही आया है। 

अजीत ने फोन किया  अपने घर में टेस्ट किया इसकी रिपोर्ट निगेटिव ही आती आप actual टेस्ट कराओ। उनकी सलाह भी ठीक है। 

पता नही क्यो भरोसा नही करते हम अपने products पर। 

मुझे लगता है कल से हल्की walk शुरू करनी चाहिए पर बेटी अभी ताकीद कर के गई है चुपचाप दो दिन आराम करिये। फिर देखते है क्या करना है।

इस बुखार ने सिखाया है उम्र नम्बर हो सकती है पर शरीर नही सो walk running exercise पर थोड़ा अंकुश लगाना चाहिए 

महाकाल पर ध्यान लगाया तो बोले बेटा आराम करना चाहिए कभी कभी। 

साधारण सी बात लम्बी हो गई है जब से किताबें लिखने लगा हूँ थोड़े से मन नही भरता माफी के साथ पढ़ना जरूरी नही हैं। सब ठीक है।

हरीश शर्मा

Tuesday, December 7, 2021

इफ्फी यात्रा 2021 गोआ

इफ़्फ़ी यात्रा गोआ 2021

गोआ से हरीश शर्मा

और देखते सुनते 8 दिन का सफर खत्म हुआ इन आठ दिनों में बहुत कुछ नया देखने सीखने को मिला। सबसे विशेष रहा अमृत महोत्सव के चलते 75 चुने हुए खास प्रतिभाशाली प्रतियोगी। अब देखना यह है कि अगले साल इनमें से कितने अपने किसी नये project से 53वें इफ़्फ़ी का हिस्सा बनेंगे। 

सरकार को भी चाहिए किसी माध्यम से इनकी मदद की जा सके। एनएफडीसी या पीआईबी से यह लोग सीधे जुड़ पाये। हालाँकि यह सबसे कठिन है। साथ ही क्या अगले वर्ष नये 76 प्रतिभाशाली लोगो का चुनाव होगा । फ़िलहाल मन्त्री जी या पीआईबी ने इस विषय मे कुछ नही कहा है कह देते तो लोग अभी से तैयारी करते अधिक लोग शामिल होते चुनाव कठिन होता।

अंतिम दिन सुनकर अच्छा लगा जब सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा ने कहा फ़िल्म निर्माताओं को भारतीय संस्कृति और परम्पराओ पर फ़िल्म बनानी चाहिए एनएफडीसी और अन्य आर्थिक सहयोग ऐसी फिल्मों को उपलब्ध कराया जायेगा। इस पर मेरा कहना है कि मंत्री महोदय पिछले 7 साल की 7 इसलिए कि 7 साल से उनकी सरकार है फिल्मों की list एनएफडीसी से मंगा कर देख लीजिए तो आपको समझ आ जायेगा कि किस तरह की संस्कृति और परंपराओं को यह संस्थान बढ़ावा दे रही है। 

मन्त्री महोदय को यह भी याद दिलाना है कि एक संस्था चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसायटी ऑफ इंडिया भी है उसकी भी खोज ख़बर लेते रहे। एनएफडीसी और बाल चित्र समिति की चर्चा फ़िल्म समारोह से कुछ पहले ही सुनने को मिलती है साल भर यह क्या करती है इसकी कोई खबर नही होती।

जापानी फ़िल्म ring wandering को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिये गोल्डन पिकॉक अवार्ड मिला इसमें 40 लाख रुपये मिलते है मेरे विचार से सभी धनराशि को आकर्षक बनाने की आवश्यकता है सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिये एक करोड़ रुपया मिलना चाहिये उसी प्रतिशत में सभी अवार्ड की धनराशि बढ़नी चाहिए अगले वर्ष से। 

किस को क्या मिला वो सब पढ़ चुके है मेरा कहना है इन फिल्मों को आम लोग कहाँ देख सकते है। जैसा मैंने पिछली बार भी लिखा एक पखवाड़े में दूरदर्शन पर इफ़्फ़ी फ़िल्म प्रदर्शित होनी चाहिए और उनका प्रचार प्रसार भी जोर शोर से होना चाहिए।

मंत्री जी ने कहा करीब सभी OTT Platforms ने इफ़्फ़ी में पहली बार सहभागिता दिखाई यह अच्छी बात है लेकिन किसी ने कोई आश्वासन दिया चुनी हुई या पुरुस्कार प्राप्त फिल्मों को हम अपना प्लेटफार्म देने को तैयार है वो हमसे संपर्क कर सकते है। यह तो निश्चित है चुनी और पुरुस्कृत फिल्में सर्वश्रेष्ठ होती है तो उन्हें ऐसा प्रस्ताव देने में संकोच नही होना चाहिए। पीआईबी को इस दिशा में कुछ करना चाहिए।

नवभारत टाइम्स के पूर्व फीचर संपादक और ज्यूरी सदस्य सुरेश शर्मा सहित कई लोगो की माँग कि वर्तचित्र और लघु फिल्मों के लिए कोई विशेष प्लेटफार्म होना चाहिए सरकार को ही इसमें पहल करनी चाहिए ऐसा मेरा मानना है वरना यूट्यूब तो जिन्दाबाद है ही मानसिक संतुष्टि के लिए। आज नही तो कल पैसे मिलने की भी उम्मीद होती ही है।

मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने फिर से अपनी माँग दोहराई फ़िल्म सिटी बनाने की। लेकिन मेरा मानना है यह इतना आसान नही है गोआ में। देश विदेश के सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल पर सबसे बड़ी दो समस्याएं है पहली टैक्सी दूसरी मोबाईल नेटवर्क जिस पर्यटन स्थल पर आज की सबसे जरूरी चीजें सरकार उपलब्ध नही करा पा रही है उस प्रदेश में फ़िल्म सिटी ? वैसे भी गोआ के लोगो को समझाना आसान नही है फ़िल्म सिटी के लिए गोआ में कम से कम 300 एकड़ जगह तो चाहिए होगी। यानि असम्भव।

खैर इफ़्फ़ी की बात कर लेते है एक दिन देखा एक स्टॉल में ईवीएम मशीन रखी है पता चला इफ़्फ़ी का लाभ उठाते हुए 2022 के गोआ विधानसभा चुनाव की जागरूकता को ही अन्जाम दे ले। लोगो ने दिलचस्पी भी ली ।

पिछली बार जब मैं इफ़्फ़ी गया था तब एक दो स्टॉल गोआ के परंपरागत सामान के भी लगे थे उन सामानों को गोआ के स्थानीय कलाकार बनाते थे। इस बार वो नही थे उस स्टॉल के होने का फायदा यह था कि इफ़्फ़ी में आये लोगो को गोआ की याद में कुछ लेना हो तो आसानी होती थी और स्थानीय कलाकारों को आमदनी का जरिया मिलता था। 

इस बार किंग फिशर का स्टॉल नही था दूसरी बाटली का था। अब किंग ही नही तो यह तो होना ही था लेकिन किंग फिशर बाजार में उपलब्ध है और Heineken ने किंगफिशर को अपने सानिध्य में ले लिया है।

इतिहास को छुपाया नही जा सकता उसी कड़ी में बंगाल में एक ही रात में 15000 लोगो का कत्लेआम कर दिया गया sainbari डॉक्यूफीचर, इसी सच को ईमानदारी से दिखाया गया है । इस पैनोरमा खंड की महत्वपूर्ण फ़िल्म को अधिक दर्शक वर्ग मिले इसकी जवाबदारी पीआईबी की होनी चाहिए।

वैश्विक महामारी lockdown के समय को भी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया है।हिन्दी फीचर अल्फा बीटा गामा ऐसी ही एक फ़िल्म है 1 करोड़ से भी कम लागत की फ़िल्म को कोविड समय में एक फ्लैट में फंस गये पति पत्नि और वो की कहानी है पति पत्नी अलग होने वाले है वो से पत्नी शादी करने वाली है और तीनों एक फ्लैट में 14 दिन फंस जाते है। अर्जेंटीना की फ़िल्म Unbalanced,अनंत महादेवन की लघु फ़िल्म The Knocker उसी श्रृंखला की फ़िल्म है।

आमतौर पर डरावनी फिल्में किसी फिल्म समारोह का हिस्सा नही होती है ऐसी फिल्मों के लिये अलग से बहुत से अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह होते है लेकिन इफ़्फ़ी में नुशरत भरउच्चा की फ़िल्म छोरी प्रभाव छोड़ती है।

इफ़्फ़ी में शाम ढले पांच संगीतकारों का बैंड कोंकणी पुर्तगाली और हिन्दी फिल्मों के गीत संगीत से स्वरलहरियों से सबका स्वागत करते है। उपस्थित जन भी भरपूर सम्मान देते फ़ोटो खिंचाते। इस बैंड का अलग ही आकर्षण रहा।

2 दिन बाद इफ़्फ़ी में फिल्मी दर्शकों की संख्या इतनी बढ़ गई कि आयोजकों को 50% की जिद छोड़नी पड़ी और शत प्रतिशत टिकट देने पड़े करीब सभी फिल्में हाउस फूल रही। किसी समारोह की सफलता का पता इसी से चलता है । लेकिन मास्टर क्लास के लिए यह व्यवस्था क्यों नही की गई समझ से परे है।

खेल फिल्मों को भी इफ़्फ़ी में बहुत पसन्द किया गया। इस कड़ी में चार फिल्में दिखाई गई। यह फिल्में थी Rookie, कोरिया की fighter, तीसरी फिल्म थी The Champion of Auschwitz सच्ची घटना पर आधारित है नाज़ी कैम्प में फंसे मुक्केबाज टेडी की कहानी है अद्भुत।

पूरे इफ़्फ़ी समारोह के दो मुख्य आकर्षण रहे पहला इफ़्फ़ी प्रांगण के बाहर वाली करीब पूरी सड़क में बहुत से स्टॉल लगाये गए इसकी खूबसूरती अंधेरा होने के बाद ही दिखती थी। बिजली की रोशनी की शानदार सजावट पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण रही।

दूसरा आकर्षण थी दक्षिण भारत की सुपरस्टार सामंथा, फैमली मेन द्वितीय के बाद हिन्दी दर्शक भी उन्हें न सिर्फ पहचानने लगे है बल्कि उनके अभिनय को भी पसन्द किया। लेकिन इफ़्फ़ी में आकर्षण थी उनकी लाल चटक साड़ी और उनकी खूबसूरती। सबसे अधिक भीड़ भी उन्हें ही देखने के लिये लालायित थी।

पहली बार इफ़्फ़ी में एक गढ़वाली फ़िल्म सुनपत दिखाई गई 35 मिनट की इस फ़िल्म के निर्देशक राहुल रावत और निर्माता रोहित रावत इफ़्फ़ी में थे। राहुल ने बताया उत्तराखंड के 1500 से अधिक गाँवो से इतना अधिक पलायन हुआ कि यह सभी गाँव भुतहा लगते है।

यह समस्या आज की नही है मैं जब 1989/90 में पिथौरागढ़ में रहता था उस समय मैं दूरदराज के गांवों में बतौर पत्रकार गया था। कई गाँव तो ऐसे देखे जिसमें एक भी इंसान नही था। जो लोग उत्तराखंड छोड़कर चले गये वो वापस नही आते । जो विदेशों में बस गये वो तो फिर भी पाँच सात साल में एक बार आ जाते है लेकिन देश के विभिन्न नगरों में स्थापित हो चुके लोग अधिक व्यस्त है। सिवाय अभिनेता हेमन्त पाण्डेय के जो हर वर्ष ही चार बार पिथौरागढ़ हो आते है।

सुनपत फ़िल्म सबको देखनी चाहिए। शायद पलायन कर चुके लोग कभी कभार घूमने ही आ जाये।

अगले साल फिर मिलेंगे इफ़्फ़ी की कहानियों के साथ।

हरीश शर्मा