Monday, April 4, 2022

कश्मीरी पंडितों की पीड़ा और न्याय

कश्मीरी पण्डितों की पीड़ा और न्याय

यह निहायत ही बचकानी बात होगी कि कश्मीरी पंडित जिन पर जुल्म हुए और मजबूरी में उन्हें पलायन करना पड़ा अब 32 सालों बाद उनमें से बहुत बड़ा प्रतिशत बहुत खुशहाल व्यवस्थित स्थापित है। मुझे नही लगता अब सब कुछ अपनी मेहनत मशक्कत से पाने के बाद देश विदेश के विभिन्न हिस्सों में रहे कश्मीरी हिन्दू वापस कश्मीर जा कर बसेंगे। तो क्या पण्डितों उनको इंसाफ नही मिलना चाहिये ?

कश्मीर फ़ाइल फ़िल्म ने मीडिया के हर क्षेत्र में ऐसी बहस चर्चा का आगाज किया है कि अखबार टीवी यूट्यूब डिजिटल मीडिया हर जगह सिर्फ और सिर्फ पंडितों की बात हो रही है पक्ष में या फ़िल्म के विरुद्ध। फ़िल्म को प्यार करिये या नफरत लेकिन आपको पंडितों से जोड़ा जरूर है। 

बातें बहुत हुई अब समाधान होना चाहिए समाधान की बात बहुत अधिक हुई नही। सबसे पहला समाधान होना चाहिए जो कश्मीरी पंडित सालों से जम्मू कश्मीर में टेंटो में रह रहे है हम केन्द्रीय सरकार को यह हक देते है कि वो उनके लिये एक ही स्थान पर पक्के 3 बीएचके फ्लैट बनाकर दे। हक देने से मतलब है सरकार हमारा पैसा पंडितों की भलाई के लिए लगाये। उनके बच्चों की पूर्ण शिक्षा बिल्कुल फ्री हो। 

सरकारे दो साल से 80% गरीब परिवारों को फ्री राशन दे रही है अब उस पर अंकुश लगना चाहिए और व्यवस्था होनी चाहिए जो वास्तव में जरूरतमंद हो उसे ही फ्री राशन मिले। टेंटो में रह रहे पंडितों को फ्लैट के साथ अगले 10 वर्षो तक फ्री राशन, नोकरी या उन्हें पैरों पर खड़े करने का प्रयास करे। वैसे मैं फ्री की सौगात के पक्ष में बिल्कुल नही हूँ शायद पण्डित भी न हो । लेकिन जरूरतमंद को सुविधा मिलनी चाहिए।

देश विदेश में रह रहे पण्डितों के पुशतैनी मकानों पर उन्हें कब्जा दिलाया जाये और उन मकानों के पुनर्निर्माण के लिए उचित मुआवजा दिया जाये। यह निश्चित है कि अब जीवन में मुक़ाम हासिल कर चुके पण्डित पुनः कश्मीर में बसने से रहे। ख़ासकर आज की पीढ़ी तो कदापी स्थापित होने के लिए नही जायेगी । लेकिन साल में एक या दो बार पण्डित अपने पुश्तैनी मकानो में जाकर जरूर खुशी मनायेंगे एकत्र होकर जश्न मनायेंगे। वो अपने पुश्तैनी मकान का कुछ भी करे उन्हें पूरा हक हैं।

हालाँकि अभी भी श्री नगर में स्थिति बहुत अनकूल नही है। कश्मीरी पण्डितो की सुरक्षा  सबसे बड़ा धर्मसंकट है। फिर क्या कश्मीरी हिन्दुओं की जमीन जायदाद पर कब्जा जमा चुके लोग थाली में परोस कर तो वापस करने से रहे। इसके लिये सरकार को संकल्प लेना होगा। कठिनाईयां है लेकिन असम्भव कुछ नही सरकार ठान ले तो क्या नही कर सकती । 370 और 35 ए भी तो इसी सरकार ने हटाया  है। 

अब मुद्दा जिम्मेवार कौन वी पी सिंह भाजपा सरकार, फ़ारुख़ अब्दुल्ला, जगमोहन या अन्य सरकारें ?

वी पी सिंह का तो एजेंडा ही कुछ और था कांग्रेस मानसिकता से आये वीपी समाज में ऐसी खाई पैदा कर गए जिसका खामियाजा अगले 100 सालों तक भुगतना पड़ेगा। उनका वो एजेंडा पूरा हुआ। वैसे भी वीपी सरकार को आये कुछ समय ही हुआ था न उनकी सामर्थ्य थी न इक्छा शक्ति इसीलिए कुछ समय बाद हमेशा के लिए उनका पतन हो गया। उन्होंने क्या कमाया सिवाय बदनामी के।

भाजपा बाहर से वीपी सिंह को समर्थन दे रही थी बाहर से समर्थन देने वाली पार्टी किसी तरह का निर्णय लेने में कतई सक्षम नही होती। ऐसी सरकारों का चलना या घिसटना ही मुश्किल से होता है। हाँ भाजपा चाहती तो पंडितों के मुद्दों पर खुद को अलग कर सकती थी। लेकिन उस समय क्या परिस्थिति थी क्या इस स्थिति में थी कि उनकी बात सुनी जाती। 

फ़ारुख़ अब्दुल्ला की भूमिका पर साज़िश के तहत जाँच होनी चाहिए। 19 जनवरी1990 को कश्मीरी पण्डितों का कत्लेआम होता है उन्हें इस कदर डराया धमकाया जाता है कि 4-5 लाख लोग रातों रात अपनी जान इज्जत आबरू बचाने के लिए मजबूरी वश कश्मीर छोड़ने पर विवश हुए 18 जनवरी 1990 को फ़ारुख़ अब्दुल्ला मुख्यमंत्री स्तीफा देते है जिनके कार्यकाल में 19 जनवरी को कत्लेआम करने वालों को सह मिलती रही थी। 

क्या ऐसा सम्भव है कि एक दिन पहले तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले फ़ारुख़ को पता ही ना हो कि कल क्या होने वाला है। सोची समझी साजिश के तहत फ़ारुख़ स्तीफा देकर चुप्पी साध लेते है। उनकी हिम्मत नही होती कि वो कत्लेआम और पण्डितों के साथ हुए अत्याचार पर कोई बात कह सके। यानि वो पंडितों पर हुए हत्याचार और अत्याचार में बराबर के भागीदार है और इसकी सजा उन्हें मिलनी चाहिए। 

याद रहे जब कश्मीरी पंडितों की हत्या और अत्याचार होना शुरू हुए थे उस समय दिल्ली में राजीव गाँधी और कश्मीर में फ़ारुख़ अब्दुल्ला की सरकार थी आतंकवाद चरम पर था उस पर नकेल कसने के ठोस प्रयास नही किये गये । आतंकवादियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वो जब चाहे किसी को कत्ल कर दे अगवा कर ले बलात्कार कर दे शरीर को चीर दे, कत्ल कर मृतक पंडित के चारो तरफ जश्न मनाये। 

आप कह और सोच सकते है कि सेना तो उस समय भी थी वो कुछ क्यों नही कर पा रही थी। उसकी वजह थी कि आज की सरकार की तरफ़ से कड़े फैसले लेने की छूट उस समय आर्मी को नही थी। आज जैसे आतंकवादियों को तुरंत हलाक करने में समय नही लगता वैसा उस समय की सेना को छूट नही थी। आर्मी के हाथ बंधे थे। वरना भारत की सेना के सामने किसी आतंकवादी की क्या मजाल जो सप्ताह भर से अधिक जीवित रह जाये। जैसा आज होता है सेना उस समय भी वैसी ही थी जैसी आज है। 

जगमोहन ने कश्मीर के राज्यपाल के रूप में अपने पहले कार्यकाल में कश्मीर का कायापलट किया था जो विकास किया था उसके मुरीद आज भी कश्मीर के हर वर्ग में मिल जायेंगे। 

दूसरा कार्यकाल उनका 19 जनवरी 1990 की रात जम्मू पहुँचने से हुआ था कश्मीर के सभी आलाधिकारी उनकी जी हजूरी में जम्मू पहुँचे हुए थे राज्यपाल जगमोहन को 19 को ही श्रीनगर पहुँचना था लेकिन बर्फवारी और खराब मौसम के चलते वो न हवाई न जमीनी मार्ग से श्रीनगर पहुँच पा रहे थे । जम्मू में बैठकर उन्होंने केन्द्रीय सरकार पर सख़्त कार्यवाही करने का दबाब डालने की कोशिश की लेकिन दिल्ली में बैठे हुक्मरान समझ ही नही पाये कि पंडितों पर कत्लेआम अत्याचार जुल्म इतना भयानक हुआ है या उन्होंने समझने की जरूरत ही नही समझी।

फिर उस समय आज की माफ़िक डिजीटल माध्यम भी नही था कि खबर खबर से पहले पहुँच जाये। 

32 साल या दो पीढ़ी का समय क्यों लगा पंडितों की पीड़ा को समझने और कश्मीर फ़ाइल के माध्यम से देश की प्रतिक्रिया मिलने में ?

दरअसल कश्मीर फ़ाइल अभी के काल खंड में बनने और रिलीज होने में वर्तमान सरकार में ही सम्भव था। पिछले 32 वर्षों में पहली बात तो इस तरह की फ़िल्म बनती नही बन जाती तो रिलीज ही नही हो पाती। वजह कांग्रेस और भाजपा की अटल सरकार मिली जुली सरकारें थी मिली जुली सरकारें पण्डितों पर हुए हत्या-अत्याचारों पर कोई ठोस फैसले लेने की स्थिति में नही थी। उन्हें किसी तरह अपनी सरकार का कार्यकाल पूरा करना था। 

आप सोचिए कश्मीर फ़ाइल के विरोध में आज कितने लोग उठ खड़े हुए है यदि ऐसा पहले होता तो विरोध करने वाले पण्डितों पर हुए अत्याचार को नया ही रंग दे देते। 

आज विरोध करने वालो की आवाज़ इसलिये कमजोर लग रही है क्योंकि कश्मीरी पण्डितों के पक्ष में पूरे देश ही नही विदेश में भी आवाज़ इतनी जोर से बुलंद हुई है कि सच सामने आ गया है सच को आप कुछ समय के लिए दबा सकते है इतिहास को साजिश के तहत तोड़ मरोड़ सकते है लेकिन सच और वास्तविक इतिहास समयानुसार अपना रंग दिखाते जरूर है। पण्डितों के सच और इतिहास के रंग की रंगत दिखाने में 32 साल लग गये लेकिन रंग बड़ा चोखा आया है।

कश्मीर से बहुत अलग नही है बंगाल की त्रासदी 

उदाहरण के लिए मैंने मेरे से पहले और बाद की पीढ़ी ने कश्मीरी पंडितों के विषय में पढ़ा जरूर लेकिन गम्भीरता को नही समझ पाये ठीक वैसे ही जैसे कि बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा बल्तकार आगजनी और पलायन को नही समझ पाए सोचिए आज हर तरफ मीडिया सोशल मीडिया टीवी मीडिया मोबाइल मीडिया होने के बाद भी दिल्ली मुम्बई या देश के अन्य हिस्सों में रह रहे लोग बंगाल की पीड़ा नही समझ पाए तो 32 साल पहले के कत्लेआम पलायन की पीड़ा कैसे समझ पाते, कश्मीर फ़ाइल की तरह ही जब कभी बंगाल के पीड़ितों पर फ़िल्म बनेगी तब हम आम जन उनकी पीड़ा को समझ पाएंगे।

वापस कश्मीर पर आते है 

प्रश्न यह है कि मोदी सरकार 7 साल क्या कर रही थी पण्डितों को न्याय देने के लिए क्या वो कश्मीर फ़ाइल का इंतजार कर रही थी ?

प्रश्न बहुत सटीक है इसे ऐसे समझिये पहले कार्यकाल में सम्पूर्ण जनादेश वाली सरकार थी और देश को उनसे बहुत उम्मीदें थी। चुनोतियाँ बहुत थी पूरा विपक्ष एकजुट होकर भाजपा पर बेमतलब का दबाब डालने की कोशिश कर रहा था। भाजपा विभिन्न प्रदेशों के चुनावों को जीत कर खुद को और मजबूत करने के सफल प्रयास कर रही थी, 

पण्डितों को न्याय का विचार प्रधानमंत्री के दिमाग में हमेशा था और होगा वो इन्तजार कर रहे थे सही समय का, कश्मीर फ़ाइल ने राहे आसान कर दी है अब पूरी दुनियां पण्डितों के साथ है । 

सरकार क्या कर सकती है समाधान शुरू में बताए है लेकिन सरकार में बैठे लोग और प्रधानमंत्री मुझसे कहीं बेहतर कार्यवाही करेंगे ऐसी उम्मीद कश्मीरी हिंदुओं को और इस देश को उनसे है।

सबको पता है प्रधानमंत्री अपने औचक निर्णयों से सबको आश्चर्य में डालते रहे है। 370 और 35 ए ऐसे ही निर्णयों की बानगी है ।

दोषियों को सज़ा मिलना भी जरूरी है। उस समय से अभी तक हमें यह समझाने की कोशिश होती रही है कि कश्मीरियों पर जुल्म पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने किया था यह सच हो सकता है लेकिन स्थानीय कश्मीरी मुसलमानो की सहभागिता थी प्रतिशत कम बढ़ हो सकता है।

बहुत से लोग और गुलामनबी आज़ाद कह रहे है पूरा सच नही दिखाया गया फ़िल्म में । क्या दिखाते कश्मीरी मुसलमान आतंकवादी बनकर कश्मीरी मुसलमानों को मार रहे है। फिर यदि किसी को गिलास आधा भरा या आधा खाली लग रहा है तो लोग आज़ाद है अपनी बात रखने के लिए फ़िल्म बनाये पूरा सच दिखाए। केजरीवाल की मदद भी ली जा सकती है। फ़िल्म बनने के बाद केजरीवाल के सहयोग से उस फिल्म को यूट्यूब पर भी फ्री डाल सकते है। फ़िल्म की लागत तो गुलाम फ़ारुख़ केजरीवाल  महबूबा मुफ्ती से मिल ही जायेगी। फ़िल्म भी झूठी नही होगी।

यही समय है कि गोधरा कांड, 1984 के दंगे, पंजाब आतंकवाद, इमरजेंसी जैसे विषयों पर भी फ़िल्म बननी चाहिए। इतिहास सजग चुस्त दुरुस्त रहना चाहिए। 

तुरन्त प्रश्न आ गया गुजरात दंगों पर क्यों नही । बिल्कुल बननी चाहिये फिल्मकारों को आगे आना चाहिए सच दिखाना चाहिये। गोधरा पार्ट 1 और गुजरात दंगे पार्ट 2 भी बनायी जा सकती है। सुझाव दे दिया है अमल करें।

हरीश शर्मा


Wednesday, March 16, 2022

प्रमोद सावन्त जी - गोआ के सामने बेहतरीन मौका है

                   गोआ का सामने बेहतरीन मौका है


भाजपा फिर से गोआ में सरकार बना रही है। प्रमोद सावंत करिश्माई मुख्यमंत्री नही है हम सबके बीच के ही लगते है सरल सपाट बोलने वाले। गोआ की जीत में भाजपा के साथ प्रमोद सावंत को भी श्रेय मिलना चाहिये। चुनाव से पहले के 4-5 महीने आसान नही थे सरकार में 4.6-8 साल मलाई खाने वाले कई मंत्रियों और विधायकों ने पार्टी छोड़कर अपने अपने उल्लू सीधा करने की कोशिश की। 

यह ठीक है कि ममता बनर्जी की टीएमसी केजरीवाल की आप ने भाजपा की राह आसान बनाई । कांग्रेस का नुकसान अधिक बड़ा हुआ। 


मुझे याद है अपने 3 साल के गोआ प्रवास के दौरान मैं देखता था प्रमोद सावंत से अधिक मीडिया में माइकल लोबो के बतौर मन्त्री  बयान छपते थे प्रमोद सावंत के कम । कई बार लगता था लोबो मुख्यमंत्री या सावंत। लेकिन सावंत की चोट सही समय पर होती थी लोबो को रोज छपने के चस्का था । लोबो के समीकरण गड़बड़ा गये नही तो वो फिर मंत्री बनते। मुझे उम्मीद है अब भाजपा उन्हें किसी भी स्थिति में वापस नही लेगी। 

वैसे फतोरदा के विधायक विजय सरदेसाई सबसे अधिक छपने वाले नेता थे ऐसा मुझे लगता था । सरकार का कोई भी बयान आये उसका विरोध बयान अगले दिन अखबारों में होता था। उन्होंने मीडिया पर अच्छा प्रभाव कायम किया था। अपनी सीट निकालने में वो माहिर है उनका गठबंधन भी काम नही आया। वह महत्वाकांक्षी नेता है लेकिन पत्ते सही पड़ नही रहे।

कॉंग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिगम्बर कामथ ने मडगांव में अच्छी पैठ बना रखी है भाजपा उनका तोड़ नही तलाश कर पाई है। 

इस बार करीब पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है प्रमोद सावंत को निर्णय लेने में आसानी होगी । पिछली सरकार में कांग्रेस से टूटकर आये विधायकों का दबाब रहता था उनमें सेकुछ मन्त्री भी बने थे जिनके अपने हित थे। 


गोआ में तीन साल रहने के दौरान मैंने पाया गोआ एक विश्व प्रसिद्व पर्यटन राज्य बन सकता है। लेकिन उसके लिये अगले छह महीनों में ही कड़े निर्णय लेने पड़ेंगे । शुरू में इसलिये कि जिन निर्णयों की बात में कर रहा हूँ उनका परिणाम अगले दो वर्षों में दिखने लगेगा।

पहला और सबसे कठिन  निर्णय है स्थानिय टैक्सी यूनियन की दादागिरी को खत्म करना मैं जानता हूँ यह बहुत ही अधिक कठिन निर्णय है लेकिन कभी न कभी तो लेना ही पड़ेगा। प्रमोद सावंत को तमाम निजी टैक्सी कंपनियों को गोआ में शुरुआत करने की इजाजत देनी पड़ेगी। ओला ऊबर के गोआ आते ही गोआ का पर्यटन 40-50% बढ़ जायेगा। 

स्थानिय टैक्सी माफ़िया ऐसा न होने देने के लिये सारी हदे पार कर सकता है। हड़ताल कर गोआ को बंधक बना सकता है । गोआ माइल्स को शुरू करने की दिक्कत प्रमोद सावंत से बेहतर कौन जानता है। लेकिन उन्हें शायद यह नही पता होगा कि गोआ माइल्स ने भी प्राइवेट टैक्सियों की माफ़िक ही पर्यटनों को लूटना शुरू कर दिया है। 

उनकी जानकारी के लिये बता दूं अब आप गोआ माइल्स की टैक्सियों को सुबह 8 से 11 और शाम को 5 से 7 बजे तक के बीच नही पायेंगे यह सभी टैक्सियां प्राइवेट टैक्सियों की तरह ही काम करती है मान लीजिये आपको कोलवा से मडगांव रेलवे स्टेशन जाना है तो इस 6 किलोमीटर के प्राइवेट टैक्सी लेगी 650 रुपये, गोआ माइल्स की एप्प पर नजर आयेगा 170 रुपये करीब लेकिन टैक्सी मिलेगी नही कम से कम 2 घण्टे तक । लेकिन यदि आपके पास गोआ माइल्स के ड्राइवर का डायरेक्ट नंबर है तो वो आपसे 300-400 रुपये लेकर पहुँचा देगा। यही पर यदि ओला ऊबर होगी तो आप करीब 100 रुपये में यह सफर पूरा कर सकते है। 

टैक्सी यूनियन की दादागिरी का अंदाज इस बात से ही लगा सकते है कि गोआ माइल्स की टैक्सी किसी होटल के इर्दगिर्द भी नजर आ गई तो ड्राइवर को पिटना ही है। वजह उसकी हिम्मत कैसे हो गई हमारे क्षेत्र में घुसने की।

यह ठीक है कि ओला ऊबर आने से स्थानिय टैक्सी वालो की मेहनत बढ़ेगी स्पर्धा भी बढ़ेगी लेकिन उन्हें सोचना चाहिये कि गोआ का अद्भुत विकास होगा जिसका लाभ गोआ वासियो को ही मिलेगा।

तो सावंत जी यह निर्णय लीजिये इस निर्णय से पर्यटन का इतना विकास होगा जिसकी कल्पना भी नही कर सकते आप। 

दूसरा अमूल चूल परिवर्तन करना है आपको गोआ के नेटवर्क में सुधार करने का। एक भी मोबाइल कंपनी का नेटवर्क ऐसा नही है जो सही से कम करता हो। हम साउथ गोआ रहते थे देश मे काम करने वाली किसी भी कम्पनी की इंटरनेट सेवा यहाँ उपलब्ध नही है। एयरटेल, जिओ, टाटा, ज़ी कोई नही । प्राइवेट स्थानिय कम्पनियों के रेट इतने अधिक है कि क्या बताऊँ। हम 1400 रुपये महीना देते थे साथ ही बीएसएनएल इंटरनेट सेवा भी ले रखी थी 800 रुपये महीने में कि एक नेटवर्क खराब हो जाये तो दूसरा काम आ सके। प्राइवेट वाला 5-7 दिन तो खराब रहता ही था। 


स्थानिय लोग किसी भी नेटवर्क को घुसने ही नही देते उनका मानना है मोबाइल टॉवर लगने से ग्लोबल वार्मिग की शिकायतें बढ़ेंगी प्रदूषण बढेगा। हालाँकि कई बार मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि बहुत से टॉवर लगाने की इजाजत दी गई है और सभी टॉवर सरकारी जमीन पर लगेंगे। हमनें तो सिर्फ बयान ही पढ़े टॉवर या कोई सुविधा तो देखी नही।

जितने भी बीच है उनका सौंदर्य करण और पर्यटकों को सुविधा के तमाम इंतजाम करने की संभावना हमेशा है इसके लिये मुख्यमंत्री को किसी विदेशी बीच को देखना चाहिए। इससे उन्हें आइडिया लगेगा कि क्या नया किया जा सकता है। मैंने अपनी न्यूज़ीलैंड यात्रा के दौरान वहाँ के बीच के सौंदर्यीकरण ओर सुविधाओं को देखा था वो अकल्पनीय था। 

पणजी में माण्डवी नदी में खड़े कई कैसिनो शिप को कहीं ले जाने की बात पिछले कई सालों से पढ़ता रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है स्थिति यहीं रही तो बहुत जल्दी यह कैसिनो स्वतः ही बंद हो जायेंगे उसकी वजह है एंट्री फीस के रूप में ली जाने वाली रकम जो 3 से 6-7 हज़ार तक है। आज के डिजिटल युग में एंट्री फीस का कोई मतलब नही है पचासियों कैसिनो खेल आपके मोबाइल पर उपलब्ध है जो फ्री में है और उनकी तमाम लुभावनी स्कीम भी लगातार आती रहती है। सरकार और कैसिनो मालिकों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिये यह ठीक है इन कैसिनो से बहुत अधिक रेवेन्यू सरकार को मिलता है लेकिन उसका लाभ पर्यटकों को भी मिलना चाहिए। जहाँ तक मुझे याद है विदेशों के कैसिनो में एंट्री फ्री नही है। 


गोआ के लोगो को बहुत अधिक विकास पसन्द नही है मुझे याद है एक मेडिकल कालेज खुलने का इतना अधिक विरोध गाँव वालों ने किया कि उसे कही और ले जाना पड़ा। वो अभी तक अधर में ही है। 

रोजगार की समस्या हमेशा से किसी भी सरकार के लिये सबसे बड़ी समस्या है लेकिन गोआ के लिये अन्य सरकारों से भी बड़ी है। cag के मुताबिक गोआ सरकार पर करीब 23 हज़ार करोड़ से अधिक का कर्ज है । कमाई का सबसे बड़ा साधन mining पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा रखा है जिसकी कमाई को गोआ की life line कहाँ जाता है। केन्द्रीय सरकार के हस्तक्षेप के बाद कुछ सम्भवनाये बन सकती है लेकिन पिछले कुछ सालों से कुछ हुआ नही। 

गोआ को आसानी से आई टी का बेहतरीन क्षेत्र बनाया जा सकता है लेकिन स्थानिय लोग ऐसा होने नही देंगे वजह वही प्रदूषण । सबको सरकारी नोकरी चाहिए सरकार चाह कर भी ऐसा करने की स्थिति में नही है कर्ज में डूबी सरकार अन्य लोगो को नोकरी देकर अपने कर्ज में इज़ाफ़ा ही करेगी। गोआ के लोगो को चिन्ता इसलिये भी बहुत अधिक नही है कि पंजाब की तरह यहाँ भी अधिकतर परिवारों में एक दो जन विदेशों में स्थापित है। रही सही कसर टैक्सी से पूरी हो जाती है कई परिवार ऐसे है जिनके पास 8-10 टैक्सी होना साधारण बात है।


नोकरी की चिन्ता बहुत नही है यहाँ यदि वो होती तो प्रदूषण के नाम पर हर चीज में व्यवधान न पैदा करते। 


उत्तर गोआ और दक्षिण गोआ के आवागमन को आसान बनाने के लिए सरकार को गोआ मैट्रो के लिए कोशिश करनी चाहिए अभी से शुरू करने की माँग करेंगें तो 5 - 7 साल तक ऐसा होना सम्भव होगा लेकिन समस्या वही आयेगी स्थानिय लोगो का विरोध।

हरीश शर्मा 

मुम्बई से।




Monday, January 17, 2022

साधारण बुखार की कोई इज्जत ही नही है -

नार्मल बुख़ार की कोई इज्जत ही नही 

कुछ दिन पहले रेल से मुम्बई जाना हुआ चूँकि पलावा सिटी जाना था इसलिये रेल से पास पड़ता। ac डिब्बे अधिक ठंडे थे या ठंड अधिक थी इसलिए ठंडे थे पर थे मैं हमेशा की तरह सफर में short और टी शर्ट में था। पलावा में भी ठंड थी रेल के ac डिब्बे से भी अधिक। 

फुल बाजू के कपड़े ले नही गया था लिहाज़ा ठंड लगती रही हम इस उम्र में उम्र को एक नम्बर ही है मानते रहे।

हाँ कॅरोना के सारे precautions मापदंडों पर कोई समझौता नही किया। 3 दिन  बाद वापस आ गये सही सलामत।

आने के अगले दिन सुबह 6.30 बजे ही walk पर चला गया गोआ में सुबह की मस्त ठंड है उस पर भी गौर नही किया एक घण्टे की walk 1 घण्टा exercise की उम्र क्या है एक नंबर ही है

ठंड लग रही थी शरीर को लेकिन मन को मजबूत करते हुए मानने को तैयार नही था मैं। अगले दिन 1 घण्टा walk की जगह दौड़ लगा दी। उम्र क्या है नम्बर है इस 29 जनवरी को मात्र 58वें वर्ष में प्रवेश कर जाऊँगा ।

न न बधाई लेने के लिए नही लिख रहा वो तो 29 को फेसबुक देखने वाले कर ही देंगे जो 30 या बाद में देखेंगे कर देंगे। सामाजिक मीडिया का यह ही आंनद है अपने जन्मदिन को 8 - 10 दिन तक check करते रह सकते है।

मुद्दे पर वापस आते है दौड़ने वाले दिन शाम तक ठंड इतनी अधिक लगने लगी तो पंखा बन्द कर दिया और नौ बजे तक बिस्तर में। पहले एक चादर फिर दूसरी खेस नुमा चादर,खेस मोटी चादर को कहते है आज की पीढ़ी के लिए पता होना जरूरी है । 

थोड़ी देर में पंखा बन्द कर दिया और पतली रजाई भी आ गई नीचे वाले कमरे के पैसे वसूलने का जैसे समय आ गया था हम डुप्लेक्स में रहते है ना ना अमीर नही है हम, गोआ में मकान सस्ते ही है। 

तो अब अगला क्या मीनाक्षी बोली अरे कुछ नही उम्र का तकाजा है ठंड लग गई है बेटी ईहा ने फरमान जारी किया मैंने check किया है विक्टर हस्पताल में 1500 में कोविड टेस्ट हो जायेगा घर पर आकर करेंगे तो 4500 लगेंगे। अभी तक लग नही रहा था इसलिए बुखार check ही नही किया था। बेटी के फरमान को ok कर दिया कि जाऊँगा 4500 से 1500 ही भले गोआ माइल्स से आने जाने में करीब 500 रुपये लगेंगे। यदि वो नही मिली दादागिरी टैक्सी से जाना पड़ा तो करीब 1500 लगेंगे।

तीनों के चेहरे पर मास्क आ गये बिना मास्क के सिर्फ कुल्फी रह गई वो हम लोगो को आश्चर्य से देख रही थी सोच रही होगी तीनो डॉक्टरों की तरह क्यों लग रहे है। रात को शरीर दर्द करने लगा सिर में भी हल्का दर्द था सुबह उठा तो शरीर ने साथ ही मन ने कही आने जाने से मना कर दिया। हां थोड़ी देर धूप में बैठा तो आराम मिला।

फिर बिस्तर में, पाठ, अनुलोमविलोम ॐ और ध्यान सब किया मुझे हमेशा लगता है इनकी शक्ति से अधिक कुछ नही, हिम्मत करके एलान कर दिया आज देखते है ठीक नही हुआ तो कल जाऊँगा टेस्ट कराने। बेटी नाराज हुई बेटिया होती ही ऐसी है पापा को कुछ न हो जाये। यदाकदा ही देख है पापा को बीमारी में लेटे।

बैद्य जी की बेटी मीनाक्षी की सेवा शुरू हो गयी थी खिचड़ी, तुलसी गर्म पानी हल्दी वाला दूध आदि, अभी तक किसी अन्य को नही बताया था बेटी ने nephew अक्षत को बताया तो लल्ला ने पूछा रिनी की बात क्यो नही मान रहे। मैंने कहा मान तो रहा हूँ कल जाऊँगा। हाँ डॉक्टर ईहा ने डोलो का कोर्स शुरू करा दिया था और बैध मीनाक्षी ने बैधनाथ की महासुदर्शन बटी शुरू करा दी। 

इतनी देर तक लेटने की आदत न होने के कारण बोरीयत होने लगी यहाँ काम आये कपिल शर्मा अरे कपिल से बात नही की उनके शो देखे तो खूब हंसा। कभी कभी न्यूज़ भी देखी लेकिन कोई स्वाद वहाँ नही आया। हाँ मेरा स्वाद और सूँघने की शक्ति बरकरार थी मैं तो अपने हाथ को ही सूंघ लेता हूँ।

अब लगा मेडिकल पेशे से जुड़े बहनों को इतल्ला करनी चाहिये msg कर दिया भाई ने, दूर देश आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड में रह रही बहनों के बेचैन वीडियो फोन आ गये क्या हुआ कैसे क्यों। क्या दवाई ली आदि बुखार अभी तक 101 था उतरा नही था। 

इधर भाई सुशील ने अम्मा को बता दिया उनका तो सीधा सा उत्तर अरे सब ठीक होगा चिन्ता मत कर। 

खैर जी रात गुजर गई। सुबह लगा ठीक हूँ नहा लिया हल्कापन लगा। दीदी से बात हुई बोली covid testing kit मंगा कर टेस्ट करो। मैंने पूछा वो सही परिणाम देता है क्या। वो बोली इंग्लैंड में सनी बेटे के पूरे परिवार को करोना हुआ था तब हस्पताल ने कुछ किट देकर बोला था आने की जरूरत नही घर में test करो इलाज करो।

मैंने बोला मीनाक्षी को तो जैसा हमारे यहाँ होता है वहाँ की बात और है उन्होंने बेटी को बताया तो वो नाराज़ तो हुई माँ के सामने लेकिन किट मंगा ली।

पलावा में हम मित्र अजीत कोहली के यहाँ रुके थे लगा उन्हें बताना चाहिए msg किया तो फोन आ गया बोले पक्का कॅरोना होगा लेकिन दोनों डोज लगी है तो चिन्ता मत करिए। मेरे पापा बहन के घर में भी सबको हो गया है। 
 
थोड़ी देर में किट आ गई किट के निर्देशानुसार एप्प डाऊनलोड कर नाक में ड़ालने वाली रुई स्टिक दी गई उसे एक तरल पदार्थ में डाला गया । अब 15 मिनट में परिणाम आना था । मुझे तो पता था परिणाम negetive ही आना है।  15 मिनट बाद बेटी ने आकर मास्क के अंदर से मुस्कराकर कहा बधाई निगेटिव है रिपोर्ट । मीनाक्षी ने तो जैसे जंग जीत ली हो।

रिपोर्ट बहनों भाई और अजीत को भेजी गई सबका बधाई msg आया। 

दीदी ने msg किया नार्मल बुखार की तो कोई इज्जत ही नही है अब । थोड़ी देर में बुखार check किया तो 100 था और तीन घण्टे बाद गायब हो गया था तब से अगले दिन अभी लिखने तक नही आया है। 

अजीत ने फोन किया  अपने घर में टेस्ट किया इसकी रिपोर्ट निगेटिव ही आती आप actual टेस्ट कराओ। उनकी सलाह भी ठीक है। 

पता नही क्यो भरोसा नही करते हम अपने products पर। 

मुझे लगता है कल से हल्की walk शुरू करनी चाहिए पर बेटी अभी ताकीद कर के गई है चुपचाप दो दिन आराम करिये। फिर देखते है क्या करना है।

इस बुखार ने सिखाया है उम्र नम्बर हो सकती है पर शरीर नही सो walk running exercise पर थोड़ा अंकुश लगाना चाहिए 

महाकाल पर ध्यान लगाया तो बोले बेटा आराम करना चाहिए कभी कभी। 

साधारण सी बात लम्बी हो गई है जब से किताबें लिखने लगा हूँ थोड़े से मन नही भरता माफी के साथ पढ़ना जरूरी नही हैं। सब ठीक है।

हरीश शर्मा

Tuesday, December 7, 2021

इफ्फी यात्रा 2021 गोआ

इफ़्फ़ी यात्रा गोआ 2021

गोआ से हरीश शर्मा

और देखते सुनते 8 दिन का सफर खत्म हुआ इन आठ दिनों में बहुत कुछ नया देखने सीखने को मिला। सबसे विशेष रहा अमृत महोत्सव के चलते 75 चुने हुए खास प्रतिभाशाली प्रतियोगी। अब देखना यह है कि अगले साल इनमें से कितने अपने किसी नये project से 53वें इफ़्फ़ी का हिस्सा बनेंगे। 

सरकार को भी चाहिए किसी माध्यम से इनकी मदद की जा सके। एनएफडीसी या पीआईबी से यह लोग सीधे जुड़ पाये। हालाँकि यह सबसे कठिन है। साथ ही क्या अगले वर्ष नये 76 प्रतिभाशाली लोगो का चुनाव होगा । फ़िलहाल मन्त्री जी या पीआईबी ने इस विषय मे कुछ नही कहा है कह देते तो लोग अभी से तैयारी करते अधिक लोग शामिल होते चुनाव कठिन होता।

अंतिम दिन सुनकर अच्छा लगा जब सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा ने कहा फ़िल्म निर्माताओं को भारतीय संस्कृति और परम्पराओ पर फ़िल्म बनानी चाहिए एनएफडीसी और अन्य आर्थिक सहयोग ऐसी फिल्मों को उपलब्ध कराया जायेगा। इस पर मेरा कहना है कि मंत्री महोदय पिछले 7 साल की 7 इसलिए कि 7 साल से उनकी सरकार है फिल्मों की list एनएफडीसी से मंगा कर देख लीजिए तो आपको समझ आ जायेगा कि किस तरह की संस्कृति और परंपराओं को यह संस्थान बढ़ावा दे रही है। 

मन्त्री महोदय को यह भी याद दिलाना है कि एक संस्था चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसायटी ऑफ इंडिया भी है उसकी भी खोज ख़बर लेते रहे। एनएफडीसी और बाल चित्र समिति की चर्चा फ़िल्म समारोह से कुछ पहले ही सुनने को मिलती है साल भर यह क्या करती है इसकी कोई खबर नही होती।

जापानी फ़िल्म ring wandering को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिये गोल्डन पिकॉक अवार्ड मिला इसमें 40 लाख रुपये मिलते है मेरे विचार से सभी धनराशि को आकर्षक बनाने की आवश्यकता है सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिये एक करोड़ रुपया मिलना चाहिये उसी प्रतिशत में सभी अवार्ड की धनराशि बढ़नी चाहिए अगले वर्ष से। 

किस को क्या मिला वो सब पढ़ चुके है मेरा कहना है इन फिल्मों को आम लोग कहाँ देख सकते है। जैसा मैंने पिछली बार भी लिखा एक पखवाड़े में दूरदर्शन पर इफ़्फ़ी फ़िल्म प्रदर्शित होनी चाहिए और उनका प्रचार प्रसार भी जोर शोर से होना चाहिए।

मंत्री जी ने कहा करीब सभी OTT Platforms ने इफ़्फ़ी में पहली बार सहभागिता दिखाई यह अच्छी बात है लेकिन किसी ने कोई आश्वासन दिया चुनी हुई या पुरुस्कार प्राप्त फिल्मों को हम अपना प्लेटफार्म देने को तैयार है वो हमसे संपर्क कर सकते है। यह तो निश्चित है चुनी और पुरुस्कृत फिल्में सर्वश्रेष्ठ होती है तो उन्हें ऐसा प्रस्ताव देने में संकोच नही होना चाहिए। पीआईबी को इस दिशा में कुछ करना चाहिए।

नवभारत टाइम्स के पूर्व फीचर संपादक और ज्यूरी सदस्य सुरेश शर्मा सहित कई लोगो की माँग कि वर्तचित्र और लघु फिल्मों के लिए कोई विशेष प्लेटफार्म होना चाहिए सरकार को ही इसमें पहल करनी चाहिए ऐसा मेरा मानना है वरना यूट्यूब तो जिन्दाबाद है ही मानसिक संतुष्टि के लिए। आज नही तो कल पैसे मिलने की भी उम्मीद होती ही है।

मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने फिर से अपनी माँग दोहराई फ़िल्म सिटी बनाने की। लेकिन मेरा मानना है यह इतना आसान नही है गोआ में। देश विदेश के सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल पर सबसे बड़ी दो समस्याएं है पहली टैक्सी दूसरी मोबाईल नेटवर्क जिस पर्यटन स्थल पर आज की सबसे जरूरी चीजें सरकार उपलब्ध नही करा पा रही है उस प्रदेश में फ़िल्म सिटी ? वैसे भी गोआ के लोगो को समझाना आसान नही है फ़िल्म सिटी के लिए गोआ में कम से कम 300 एकड़ जगह तो चाहिए होगी। यानि असम्भव।

खैर इफ़्फ़ी की बात कर लेते है एक दिन देखा एक स्टॉल में ईवीएम मशीन रखी है पता चला इफ़्फ़ी का लाभ उठाते हुए 2022 के गोआ विधानसभा चुनाव की जागरूकता को ही अन्जाम दे ले। लोगो ने दिलचस्पी भी ली ।

पिछली बार जब मैं इफ़्फ़ी गया था तब एक दो स्टॉल गोआ के परंपरागत सामान के भी लगे थे उन सामानों को गोआ के स्थानीय कलाकार बनाते थे। इस बार वो नही थे उस स्टॉल के होने का फायदा यह था कि इफ़्फ़ी में आये लोगो को गोआ की याद में कुछ लेना हो तो आसानी होती थी और स्थानीय कलाकारों को आमदनी का जरिया मिलता था। 

इस बार किंग फिशर का स्टॉल नही था दूसरी बाटली का था। अब किंग ही नही तो यह तो होना ही था लेकिन किंग फिशर बाजार में उपलब्ध है और Heineken ने किंगफिशर को अपने सानिध्य में ले लिया है।

इतिहास को छुपाया नही जा सकता उसी कड़ी में बंगाल में एक ही रात में 15000 लोगो का कत्लेआम कर दिया गया sainbari डॉक्यूफीचर, इसी सच को ईमानदारी से दिखाया गया है । इस पैनोरमा खंड की महत्वपूर्ण फ़िल्म को अधिक दर्शक वर्ग मिले इसकी जवाबदारी पीआईबी की होनी चाहिए।

वैश्विक महामारी lockdown के समय को भी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया है।हिन्दी फीचर अल्फा बीटा गामा ऐसी ही एक फ़िल्म है 1 करोड़ से भी कम लागत की फ़िल्म को कोविड समय में एक फ्लैट में फंस गये पति पत्नि और वो की कहानी है पति पत्नी अलग होने वाले है वो से पत्नी शादी करने वाली है और तीनों एक फ्लैट में 14 दिन फंस जाते है। अर्जेंटीना की फ़िल्म Unbalanced,अनंत महादेवन की लघु फ़िल्म The Knocker उसी श्रृंखला की फ़िल्म है।

आमतौर पर डरावनी फिल्में किसी फिल्म समारोह का हिस्सा नही होती है ऐसी फिल्मों के लिये अलग से बहुत से अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह होते है लेकिन इफ़्फ़ी में नुशरत भरउच्चा की फ़िल्म छोरी प्रभाव छोड़ती है।

इफ़्फ़ी में शाम ढले पांच संगीतकारों का बैंड कोंकणी पुर्तगाली और हिन्दी फिल्मों के गीत संगीत से स्वरलहरियों से सबका स्वागत करते है। उपस्थित जन भी भरपूर सम्मान देते फ़ोटो खिंचाते। इस बैंड का अलग ही आकर्षण रहा।

2 दिन बाद इफ़्फ़ी में फिल्मी दर्शकों की संख्या इतनी बढ़ गई कि आयोजकों को 50% की जिद छोड़नी पड़ी और शत प्रतिशत टिकट देने पड़े करीब सभी फिल्में हाउस फूल रही। किसी समारोह की सफलता का पता इसी से चलता है । लेकिन मास्टर क्लास के लिए यह व्यवस्था क्यों नही की गई समझ से परे है।

खेल फिल्मों को भी इफ़्फ़ी में बहुत पसन्द किया गया। इस कड़ी में चार फिल्में दिखाई गई। यह फिल्में थी Rookie, कोरिया की fighter, तीसरी फिल्म थी The Champion of Auschwitz सच्ची घटना पर आधारित है नाज़ी कैम्प में फंसे मुक्केबाज टेडी की कहानी है अद्भुत।

पूरे इफ़्फ़ी समारोह के दो मुख्य आकर्षण रहे पहला इफ़्फ़ी प्रांगण के बाहर वाली करीब पूरी सड़क में बहुत से स्टॉल लगाये गए इसकी खूबसूरती अंधेरा होने के बाद ही दिखती थी। बिजली की रोशनी की शानदार सजावट पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण रही।

दूसरा आकर्षण थी दक्षिण भारत की सुपरस्टार सामंथा, फैमली मेन द्वितीय के बाद हिन्दी दर्शक भी उन्हें न सिर्फ पहचानने लगे है बल्कि उनके अभिनय को भी पसन्द किया। लेकिन इफ़्फ़ी में आकर्षण थी उनकी लाल चटक साड़ी और उनकी खूबसूरती। सबसे अधिक भीड़ भी उन्हें ही देखने के लिये लालायित थी।

पहली बार इफ़्फ़ी में एक गढ़वाली फ़िल्म सुनपत दिखाई गई 35 मिनट की इस फ़िल्म के निर्देशक राहुल रावत और निर्माता रोहित रावत इफ़्फ़ी में थे। राहुल ने बताया उत्तराखंड के 1500 से अधिक गाँवो से इतना अधिक पलायन हुआ कि यह सभी गाँव भुतहा लगते है।

यह समस्या आज की नही है मैं जब 1989/90 में पिथौरागढ़ में रहता था उस समय मैं दूरदराज के गांवों में बतौर पत्रकार गया था। कई गाँव तो ऐसे देखे जिसमें एक भी इंसान नही था। जो लोग उत्तराखंड छोड़कर चले गये वो वापस नही आते । जो विदेशों में बस गये वो तो फिर भी पाँच सात साल में एक बार आ जाते है लेकिन देश के विभिन्न नगरों में स्थापित हो चुके लोग अधिक व्यस्त है। सिवाय अभिनेता हेमन्त पाण्डेय के जो हर वर्ष ही चार बार पिथौरागढ़ हो आते है।

सुनपत फ़िल्म सबको देखनी चाहिए। शायद पलायन कर चुके लोग कभी कभार घूमने ही आ जाये।

अगले साल फिर मिलेंगे इफ़्फ़ी की कहानियों के साथ।

हरीश शर्मा

Friday, November 26, 2021

गोआ इफ़्फ़ी यात्रा 2021



इफ़्फ़ी यात्रा 21

गोआ से हरीश शर्मा

20 नवम्बर 21 इफ्फी का पहला दिन मैंने अपनी बेटी और पत्नी मीनाक्षी को inox पणजी भेजा कि देख कर आईये अच्छा लगेगा बेटी ईहा का जन्मदिन भी था 20 को। 

साउथ गोआ से नार्थ गोआ जाना अपने आप में आसान नही और वापस आना तो अधिक दिक्कत वाला है। यदि गोआ की दादागिरी टैक्सी से जाओ तो करीब 2.5-3 हज़ार लगते है एक तरफ से, वापसी में टैक्सी मिलेगी कहना कठिन है इसलिये आसान यहीं है जिस टैक्सी से जा रहे है उसी से विनती कर लीजिये भाई 7-8 बजे वापस आना है आ जाना यदि टैक्सी उस समय उस तरफ हुई तो आ ही जाते है। 


गोआ आने वालों को टैक्सी और उनके रेट सबसे बड़ा संकट है उन लोगो के लिए ईमानदार सलाह है goa miles app down load कीजिये रेट के हिसाब से यह सबसे सुविधा जनक है। 

20 नवंबर को दोनों इन्ही की टैक्सी से गये 1 हज़ार रुपये में। लेकिन कोशिश करने के बाद एक घण्टे बाद यह टैक्सी मिली। बरसात बहुत अधिक थी। जब inox वो venue जहाँ यह iffi समारोह 20 से 28 नवम्बर तक हर वर्ष होता है। 

जब वहाँ पहुँचे मुझे फोन किया यहाँ तो कुछ भी नही है। बोर्ड लग रहे है स्टॉल बन रहे है बहुत लोग भी नही है। यहाँ जो कुछ होगा कल यानि 21 से होगा। आज तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्टेडियम में उदघाट्न है। हैम लोग कही बाहर खाना खाने जा रहे उसके बाद उसी टैक्सी को बोल दिया है। 6 बजे आयेगी टैक्सी तो घर आते है। वापसी में 1 घंटे का सफर 3 घण्टे में पूरा हुआ कई जगह रास्ता oneway है बरसात भी बहुत थी सड़क पर जाम लग गया था

अगले दिन 21 नवम्बर को मैंने समारोह में जाने का विचार किया 10 बजे तैयार हो गया था लेकिन टैक्सी मिली 11.30 बजे। उत्तराखंड देहरादून के बड़े अंग्रेजी अखबार गढ़वाल पोस्ट और मेलबॉर्न ऑस्ट्रेलिया के अखबार the South asia time के लिए मैं iffi cover कर रहा हूँ उन्ही के पत्र के कारण मेरा मीडिया का पास बन गया था।

करीब एक घण्टे में inox पहुँचा। उसी टैक्सी से विनती की भाई 7 - 8 बजे मुझे यहीं से ले लेना। 

समारोह स्थल के गेट से पहले बाएं हाथ पर एक स्टॉल लगा था जहाँ से मैंने अपना आई कार्ड लिया वहीं पर डेलीगेट के पास भी बन रहे थे यदि आपको एक दिन के लिए आना है तो आपका कार्ड 350 रुपये में बन जायेगा। हालाँकि सिवाय कुछ फोटो अंदर खींचने के अतिरिक्त आपको कुछ हांसिल नही होगा वैसे तो एक डेलीगेट को 4-5 फ़िल्म देखने के टिकट मिल सकते है लेकिन चूँकि टिकट online book करने है तो same day टिकट उपलब्ध ही नही होंगे न online न टिकट खिड़की पर । मीडिया के लिए भी यहीं स्थिति है।


खैर मैं अंदर गया किसी ने मेरा कार्ड नही देखा कार्ड पर कही नही लिखा मेरा कार्ड मीडिया का है। कोड बना है स्कैन करेंगे तो details पता चलेंगी की कार्ड गले में लटकाने वाला कौन है। 

एक बैग सभी डेलीगेट और मीडिया को दिया जा रहा है जिसमे एक छोटी सी कितबिया और पेन है। रात जब घर आया तो बेटी ने हंसकर कहा आज के डिजिटल दुनियां में पेन पैड कौन देता है इन्हें iffi लिखा हुआ मास्क देना चाहिए था जो आज की जरूरत है।

पहले भी बैग मिलता रहा है लेकिन सबसे जरूरी चीज मेरे हिसाब से उस बैग में रहती थी एक किताब जिसमें चुनी हुई सभी फिल्मों की निर्माता निर्देशक अभिनेताओं की जानकारी होती थी। निर्माताओं के नम्बर होते थे। अब यह जानकारी नदारद है। ऑनलाइन वो सुविधा उपलब्ध है Iffi app down load कर लीजिये।

मेरे पास भी कोई टिकट नही था मैं कोई फ़िल्म नही देख पाया। पूरा इफ्फी समारोह सजाया बहुत खूबसूरत है फ़ोटो खींचने के लिए खूब मौके है। 


गेट से अंदर आने के बाद मैं सीधा उस भवन में गया जहाँ मीडिया रूम होता था सुरक्षा गार्ड ने बताया वो रूम बन्द है ।

फिर मैं inox की तरफ गया अच्छा लगा कुछ गोल टेबिल लगी थी कुर्सी के साथ बैठने की जगह थी। इसको फूड़ कोर्ट का नाम दिया गया है। वहाँ सिर्फ 8 छोटे फ़ूड स्टॉल लगे है। पेट भरने के लिये ठीक है कोई बहुत बड़ा आकर्षण नही है। हाँ बीयर पीने वालों के लिए भी स्टॉल है गोआ में यह जरूरी भी है ऐसा लगता है। 


Inox के ठीक सामने खड़ा था जब कुछ हलचल हुई मैंने देखा सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर बाहर निकल रहे है। मैं उनसे कहना चाहता था कि वो फ़ूड कोर्ट, मीडिया रूम भी आये देखे क्या सुविधा है। लेकिन मैं दूर था लेकिन मैं लिख तो सकता ही हूँ। 

इतने में मैंने अपने मित्र अतुल गंगवार और विष्णु शर्मा को अपनी तरफ आते देखा। अतुल की iffi ज्यूरी में अच्छी पैठ है। विष्णु पहली बार ज्यूरी सदस्य बने है। अतुल बहुत पतले हो गये है या कहे फिट हो गये है। उन्होंने कहा 1 बजे पैनोरमा ज्यूरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस है। मुझे जाना है । वो चले गये। 

विष्णु अपनी पत्नी के साथ पहली बार गोआ आये है तो उनके साथ कॉफी पीने बैठ गये। उन्हें मैंने बताया कि क्या देखें क्या ख़रीदे। 

1 बजे हम भी मीडिया रूम पहुंचे पैनोरमा ज्यूरी मंच पर जम चुकी थी। वहाँ पैनोरमा खण्ड के अध्यक्ष फ़िल्म क्षेत्र के बड़े नाम एस वी राजेन्द्र राव व अन्य सदस्य थे। बात बहस चल रही थी जो फिल्में इफ्फी में चुनी जाती है जिन्हें अवार्ड मिलता है उन्हें देखने के लिए प्लेटफॉर्म कहाँ है सिनेमाघरों तक वो फिल्में आती नही कोई चैनल दिखाता नही। राव साहब बोले हम सरकार के माध्यम से दबाब डलवा रहे है कि ott platform हमारी फिल्में वृत्त चित्र लघु फिल्में दिखाए। 


मुझे 10 वर्ष पहले की ऐसी ही प्रेस कॉन्फ्रेंस याद आ गई तब भी यहीं बात बहस चल रही थी उससे पहले भी उसके बाद भी और अब आने वाले सालों में भी यह बात बहस चलती रहेगी। 

मेरा कहना है यह बहस बैमानी है जब दूरदर्शन या कोई भी सरकारी चैनल इन फिल्मों को नही दिखा सकता तो कोई अन्य चैनल क्यों दिखायेगा। अब यूट्यूब है जहाँ आप अपनी फिल्में दिखा सकते है यदि आपकी फ़िल्म अच्छी है तो यूट्यूब का दर्शक वर्ग बहुत बड़ा है। दूरदर्शन भी राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और iffi में चुनी हुई फिल्मों लघु फिल्मों और वृत चित्रों को दिखाता था पैसे भी देता था। अब की क्या स्थिति है मुझे पता नही।

इफ्फी में चुनी हुई फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है अच्छी फिल्में वृत चित्र लघु फिल्में बाहर के देश खरीद भी लेते है। लेकिन मेरा मानना है समारोह में चुनी फिल्मों से जो सुकून मिलता है वो अगली लघु या वर्तचित्र फ़िल्म बनाने की तैयारी कराता है।

https://youtu.be/-mVNTtRzF84

जैसे मैने भी एक लघु फ़िल्म निर्मित की थी आखिरी मुनादी वर्ष 2001 में, वो फ़िल्म करीब 10 बड़े फ़िल्म समारोह में चुनी गई थी। अमेरिका के जर्सीशोर फ़िल्म समारोह में चुनी गई थी जिसके चलते हमारा 10 साल का वीजा लगा। हालाँकि हमें उस फिल्म से कोई कमाई नही हुई लेकिन ग्राफिस एड्स जैसी बड़ी विज्ञापन कम्पनी  के मुकेश गुप्ता ने हमें उस समय 2 लाख रुपये दिए थे फ़िल्म निर्माण के लिए । शार्ट फ़िल्म जब भी यूट्यूब पर देखता हूँ रोंगटे खड़े हो जाते है गुरुर होता है हमनें इतनी शानदार फ़िल्म बनाई है। मित्र एहसान बख़्श ने एक शानदार फ़िल्म का निर्देशन किया। 


खैर आगे बढ़ते है जब हम घूम रहे थे तो विष्णु ने मुझे बताया दिखाया तीन चार लोग एक जगह बैठे बात कर रहे थे मुझे बिल्कुल नही लगा यह लोग फिल्मों से जुड़े हुए होंगे । विष्णु उनसे मिले मुझे मिलाया और बताया कि यह निर्देशक है यह बच्चा और दूसरे व्यक्ति के लिए बोले बहुत अच्छे अभिनेता है इनकी फ़िल्म Koozhangal भारत की तरफ से एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए चुनी गई है। मैं आश्चर्य में था फ़ोटो खींचा कर मैं कोने में गया मैंने फ़िल्म के विषय मे पढ़ा वीडियो देखा। वो सरल फ़िल्म है लेकिन विशुद्ध सिनेमा है। मुझे मौका मिलेगा तो इनसे बातचीत आप लोगो के लिए करूँगा।

उसके बाद मीडिया रूम गया मीडिया रूम यानि जहां तमाम मीडिया वाले बैठ कर कम्प्यूटर पर खबरे लेख लिखकर भेजते है लेकिन इस रूम को देखकर अफसोस हुआ दो तीन छोटे कमरों को मीडिया रूम का नाम दे दिया गया है । अब मैं चाय कॉफी तलाशने लगा मैंने देखा एक कोने में एक छोटी सी मशीन थी एक लड़का वहाँ बैठा चाय कॉफी बना रहा है। मैंने काफी बनवाई तब तक एक पत्रकार आये लड़के से बोले चाय दो और बिस्किट का पैकेट दो तब पता चला बिस्किट भी है। तब मुझे पुराना मीडिया रूम और उससे लगा किसी फाइव स्टार होटल का कॉफी रूम याद आया। लेकिन जो भी उपलब्ध रहा होगा वहीं सुविधा दी इफ्फी ने। 


मैंने देखा पीआईबी का एस एम एस था 4.30 बजे 75 प्रतिभाशाली चुने हुए प्रतियोगियों में से पाँच के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी। मैं उसमे चला गया वहां उन लोगो से बात की । अधिकतर विजेताओं ने बताया कि उन्होंने अपने प्रोजेक्ट मोबाइल से बनाये है खुद ही एडिट की थी। एक युवा शुभम शर्मा  जिनके दो प्रोजेक्ट 75 प्रतिभाशाली प्रतियोगिता में चुने गये जिसमें एक मीठा खिलौना और एक म्यूजिक वीडियो के माध्यम से मेरी प्रतिभा को सम्मानित किया गया। उनका मानना है इस अवॉर्ड से जोश बढ़ा है अगले वर्ष मेरे निर्देशन में बने वृत चित्र का चुनाव हो वो iffi में दिखायी जाए इस सपने को इस अवार्ड ने पंख लगाये है। 

                                  शुभम शर्मा


Wednesday, November 17, 2021

Spencer Film on Princess Diana releasing all India on Friday 19th November



SPENCER, FILM ON PRINCESS DIANA, TO RELEASE IN INDIA ON 19TH NOVEMBER  

Impact Films announces the theatrical release of the current year’s one of the most talked-about and highly rated English language films, titled SPENCER by Pablo Larrain across the  Nation on 19th Nov. It features Kristen Stewart in the lead role of Princess Diana and Jack Farthing as Prince Charles, beautifully supported by Sally Hawkins and Timothy Spall.  


Spencer concentrates on three turbulent days in the life of Diana during the Christmas of 1991  where Diana and her family are staying at Sandringham, a well known royal tradition. Over  Christmas Eve, Christmas Day and Boxing Day, Diana realises that her marriage is breaking down and doesn’t want to be the future queen. The biopic gives the audience a glimpse into the character of Princess Diana whizzing through many official engagements she attended, a frosty dynamic with the royal family, and plenty of emotional scenes exploring the late Princess’s vulnerability and how she struggled to fit in. 


The film debuted at the Venice Film Festival. It then screened at several renowned film festivals like Toronto, Telluride, New York, etc., before getting released in the United States and the United Kingdom on 5th Nov. It has already emerged as the frontrunner in the upcoming Academy Awards for the Best Actress for Kristen Stewart. It is likely to land nominations in some other categories as well. On playing Diana, Kristen Stewart says,” At that moment, we’re not trying to depict what happened in there, but it is, maybe, an idea of what happened inside of her.” 


Chilean director Pablo Larrain has created several flicks with strong female characters and is known for Oscar-nominated film Jackie. Pablo, who has been fascinated and had been thinking about making a film on this subject for a while, believes, ”Everything our Diana sees is a reflection of her memories, her fears and desires and maybe even her illusions.” 


SPENCER is a biopic that excels in every filmmaking department, including Script by  Steven Knight, Cinematography by World famous Claire Mathon, Costume Designer  Jacqueline Durran, Composer Jonny Greenwood, Makeup & hair design by Wakana Yoshihara and Production Design by Guy Hendrix Dyas. The film was shot entirely in Germany & UK.  

SPENCER is being brought to Indian Screens through Distribution and Production House  Impact Films. They have made a name for themselves as the leading Distributor of Independent  Award Winning World Cinema titles in India like Parasite, Another Round, A Fantastic  Woman, Capernaum, Portrait of a lady on Fire, etc. According to its founder Ashwani  Sharma, “Lady Diana is so popular in India for decades that SPENCER is an obvious choice not only for fifty-year-olds but also a perfect vehicle for Millenials & Generation Z to know about this piece. Of history which is so sensational and magnificent.” 


Here is the link to the trailer of the film: SPENCER - Official Indian Trailer| Kristen Stewart| Pablo  Larrain| In Indian Theatres this November - YouTube

https://www.youtube.com/watch?v=tGvZOpD33z4


-Harish Sharma

H. S. Communication

9967788500 | harishsharma1

@gmail.com

Tuesday, November 9, 2021

इफ्फी - अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह गोआ


इफ्फी -  अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह गोआ 

इफ्फी यानि इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया जो हर साल गोआ में होता है मैंने इस फ़िल्म समारोह में बतौर पत्रकार 6-7 साल शिरकत की है। 2 साल बतौर डॉक्यूमेंट्री और शार्ट फ़िल्म निर्माता निर्देशक इस समारोह में आया था। दो साल कुछ फिल्मों का प्रचार करने भी गया। 

इस फ़िल्म समारोह का अपना ही आकर्षण है जो एक बार आ गया वो हर साल आना चाहता है। चाहे आईनॉक्स और कला भवन में दिखाई जाने वाली देश विदेश की फिल्में हो या एनएफडीसी का तीन दिवसीय जे डब्ल्यू  मैरियट में होने वाला समारोह हो दोनो ही विशेष है। 

दोनो समारोह में देश विदेश के तमाम सितारें आते रहे है उनसे मिलना उनको सुनना शानदार अनुभव रहा है। हालांकि मुझे पहले शिकायत थी कि एनएफडीसी के समारोह में हर साल निमंत्रित सितारें और पत्रकारो में बदलाव क्यों नही होता । हर साल गिने चुने वहीं फ़िल्म निर्माता निर्देशक सितारें आते है। 

कुछ वर्षों के अनुभव के बाद लगा सितारों को बुलाना आसान भी नही है। जो उपलब्ध हो जाते होंगे वही आ पाते होंगे। लेकिन निमंत्रित पत्रकारो में कई तो ऐसे रहे है जिन्हें पत्रकारिता छोड़े हुए भी जमाना हो गया लेकिन गोआ में तीन दिन का सुख उन्हें मुफ्त मिलता है वो भी सपरिवार। 

लेकिन उम्मीद है सरकार के बदलाव ने बहुत कुछ बदलाव किए होंगे । इस वर्ष कई सालों के बाद शामिल हो रहा हूँ तो पता चलेगा क्या कुछ बदला है। 

एनएफडीसी और इफ्फी समारोह में एक बुनियादी फर्क है वो यह कि इफ्फी सबके लिए है आप और मैं इसमें आसानी से जा सकते है गोआ घूमने आया पर्यटक भी प्रतिदिन मिलने वाला टिकट खरीद कर इसका आनन्द उठा सकता है लेकिन एनएफडीसी में शामिल होना सबके बस की बात नही है तीन दिन की डेलीगेट फीस 5500 से 7000 रुपये है। और इफ्फी की 1180 रुपये 8 दिन के लिये। हाँ विद्यार्थियों के लिए इफ्फी रजिस्ट्रेशन फ्री है वो ऑनलाइन बुकिंग कराकर 4 फिल्मों के टिकट प्रतिदिन पा सकते है।

एनएफडीसी का तीन दिवसीय फ़िल्म बाज़ार 20 से 22 नवम्बर  ओर 8 दिन का इफ्फी 20 से 28 नवम्बर तक चलेगा हर साल यही तिथि निश्चित है लेकिन कोविड के चलते पिछले साल का समारोह 2021 के जनवरी में हुआ था। इस बार यह 52वाँ समारोह है।

मीडिया के लिए रजिस्ट्रेशन फ्री है ऑनलाइन कुछ औपचारिकताओं के बाद आपको कार्ड मिल जायेगा। फ़िल्म देखिये दुनियाभर की। मुलाकात कीजिये फ़िल्म सितारों और निर्माता निर्देशको से। पुराने परिचित अपरचित पत्रकारों से । आईनॉक्स हाल के बाहर लगे विभिन्न खाद्य स्टालों से अपनी पसंद का खाना खाइये खिलाइये। किंगफिशर बीयर का स्वाद लीजिये, अब वो स्टाल लगता है या नही मुझे नही पता। 

मीडिया के लिये एक हाल में कई कम्प्यूटर की व्यवस्था की जाती है जहाँ से पत्रकार अपनी रिपोर्ट अपने यहाँ भेज सकते है मुझे उम्मीद है कम्प्यूटर की जगह अब लेपटॉप ने ले ली होगी वैसे तो अब फोन ही इतने काबिल है कि उनसे ही आप अपनी स्टोरी भेज सकते है। 

वैसे मेरी पसन्दीदा जगह इस समारोह में मीडिया हॉल के बाहर ताज या किसी पंचतारा होटल द्वारा मीडिया के लिए चाय काफी बिस्किट की भरपूर व्यवस्था की जाने वाली रही है। काफी की चुस्कियों के साथ मीडिया मित्रो के साथ गपशप मुलाकाते मज़ेदार रहती है। 

एक बात जो मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है वो है गोआ के मुख्यमंत्री का इफ्फी में आना वो भी बिना किसी तामझाम के न कोई सुरक्षा न कोई प्रोटोकाल । जब मैं पहली बार गोआ फेस्टिवल में गया तो मैंने उस समय के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत को अपने साथ वाली मेज पर अकेले भोजन करते हुए देखा यह मेरे लिए किसी अजूबे से कम नही था । उनको हर साल देखता एक दो बार बात भी हुई लगा हमारे ही बीच का कोई व्यक्ति है। 

बाद में सत्ता परिवर्तन हुआ तो लगा उस समय के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर आयेंगे क्या। मेरे लिए सुखद आश्चर्य था मनोहर पर्रिकर तो कामत जी से दो कदम आगे निकले वो साथ ही बैठ जाते खाना उनकी तरफ से ही होता यानि वो अपनी जेब से पैसे निकाल कर देते थे अपने भी साथ बैठे मीडिया के खाने के भी।

उनकी सुरक्षा मुख्य गेट के पास होती थी। उन्होंने गोआ फेस्टिवल में बहुत सुधार किये। 

अब देखना यह है कि क्या वर्तमान मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत अन्य मुख्यमंत्रीयो की तरह हम यानि मीडिया का हिस्सा बनते है कि नही।

हरीश शर्मा